- अदालत ने नाबालिग बच्चों की कस्टडी मामले में पिता को प्राकृतिक संरक्षक मानते हुए मां की याचिका खारिज की
- अदालत ने कहा कि जब तक पिता ने बच्चे को मां से जबरन नहीं हटाया, तब तक उसकी कस्टडी अवैध नहीं मानी जा सकती
- पिता की कस्टडी के खिलाफ याचिका तभी स्वीकार्य होती है जब कस्टडी गैरकानूनी या बिना वैधानिक अधिकार के हो
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बच्चों की कस्टडी को लेकर एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने हैरान कर दिया है. अदालत ने एक नाबालिग बच्चे की मां द्वारा दायर कस्टडी की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि पिता नाबालिग बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक होता है. जब तक किसी अदालत के आदेश का उल्लंघन कर बच्चे को उसकी मां से जबरन अलग नहीं किया जाता, तब तक पिता की कस्टडी को अवैध नहीं माना जा सकता. याचिकाकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि उसका पूर्व पति 2022 में बंदूक के बल पर उसके दो नाबालिग बच्चों को अपने साथ ले गया और तब से उन्हें अवैध रूप से अपने पास रखा हुआ है.
बस अदालत के आदेश का न हो उल्लंघन
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले को आप ऐसे समझ सकते हैं कि अगर किसी पति-पत्नी के अनबन चल रही है और वे दोनों अलग-अलग रहे हैं. इस दौरान अदालत के किसी आदेश को नहीं तोड़ा जाता है, तो पिता बच्चों को अपने साथ रख सकता है. फिर चाहे पिता, बच्चों को जबरन लेकर ही क्यों न गया हो. अदालत का कहना है कि पिता का बच्चों पर अधिकार होता है, जो उसे नेचुरली मिलता है.

एक मां की गुहार...
न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने ‘तेजस्विनी गौड एवं अन्य बनाम शेखर जगदीश प्रसाद तिवारी' मामले में इाई कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि बच्चों की कस्टडी के मामलों में याचिका तभी स्वीकार्य होती है, जब कस्टडी गैरकानूनी या बिना वैधानिक अधिकार के हो. अंजलि देवी की ओर से दलील दी गई कि बच्चों की कस्टडी के लिए विभिन्न मंचों पर कई आवेदन किए गए, लेकिन संबंधित अधिकारियों द्वारा कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई.
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अदालत ने क्यों नहीं सुनी मां की याचिका?
अदालत ने 10 अप्रैल को पारित अपने आदेश में आईपीसी की धारा 361 की व्याख्या करते हुए कहा कि किसी नाबालिग को उसके पैरेंट्स से दूर करना अपराध है, लेकिन यह अपराध तभी बनता है, जब बच्चे को उसके प्राकृतिक संरक्षक से अलग किया जाए. अभिभावक एवं आश्रित अधिनियम की धारा 4(2) के अनुसार पिता को प्राकृतिक संरक्षक माना गया है. अदालत ने कहा कि केवल यह आरोप कि पिता ने बच्चों को जबरदस्ती मां से अलग किया, अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि बच्चे अवैध कस्टडी में हैं. अदालत ने यह भी कहा कि वर्तमान मामले में 5 वर्ष से अधिक उम्र के दोनों बच्चे 2022 से अपने पिता के साथ रह रहे हैं और कोई ऐसी असाधारण परिस्थिति प्रस्तुत नहीं की गई है जिससे यह प्रतीत हो कि उनकी कस्टडी गैरकानूनी है. ऐसे में इस अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है.
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