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'भगवा ने मारा...' कासगंज हिंसा पर बोली थीं अफसर, अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दी क्लीन चिट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2018 कासगंज हिंसा पर फेसबुक पोस्ट लिखने वाली यूपी की अधिकारी रश्मि वरुण को क्लीन चिट दे दी है. कोर्ट ने कहा कि केवल अखबार की खबरों के आधार पर कार्रवाई करना सही नहीं है.

'भगवा ने मारा...' कासगंज हिंसा पर बोली थीं अफसर, अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दी क्लीन चिट
Allahabad HC Affirms Clean Chit To UP Officer

यूपी के कासगंज हिंसा मामले में कथित विवादित टिप्पणी करने वाली सीनियर अधिकारी रश्मि वरुण  को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ी राहत दी है. अदालत ने यूपी सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया. जिसमें सरकार ने 2018 के कासगंज हिंसा से जुड़ी एक कथित फेसबुक पोस्ट को लेकर एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी पर लगाए गए अनुशासनात्मक दंड को बहाल करने की मांग की थी. अधिकारी पर आरोप था कि उन्होंने फेसबुक पर लिखा था कि उस 'युवक को भगवा ने मार डाला.'

कोर्ट ने दी अधिकारी को राहत

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने यूपी पब्लिक सर्विस ट्रिब्यूनल के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें आर्थिक और सांख्यिकी प्रभाग में उप निदेशक के पद पर कार्यरत रश्मि वरुण के खिलाफ जारी दंड आदेश को रद्द कर दिया गया था. बेंच ने यह पाया कि अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई पूरी तरह से एक अखबार की एक रिपोर्ट के आधार पर की गई थी, जिसका अधिकारी ने स्पष्ट रूप से खंडन किया था. 

लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, हाई कोर्ट ने कहा कि जवाब मिलने के बावजूद, अधिकारियों ने प्रतिवादी द्वारा की गई मूल फेसबुक टिप्पणियों को रिकॉर्ड पर लेने की जहमत भी नहीं उठाई, बल्कि वे अखबार के लेख के आधार पर ही आगे बढ़ते रहे. अदालत ने आगे कहा कि जब अधिकारी ने खुद को उन टिप्पणियों से 'अलग' कर लिया था, तो जांच के दौरान अधिकारियों का यह दायित्व बनता था कि वे दंड आदेश पारित करने से पहले वास्तविक फेसबुक टिप्पणियों की सत्यता की जांच करें.

क्या था मामला?

रश्मि वरुण पर आरोप है कि 2018 में हुई कासगंज हिंसा को लेकर उन्होंने फेसबुक पर कथित टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था कि एक युवक की 'भगवा' द्वारा हत्या कर दी गई. उन्होंने यह भी कहा था कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर रैली से नदारद थे और उन पर 'भगवा रंग' हावी हो गया था. फेसबुक पोस्ट पर आधारिक खबरों के आधार पर फरवरी 2018 में अधिकारी के खिलाफ एक चार्जशीट दायर की गई. इसमें कहा गया कि उनकी पोस्ट सरकार की आलोचना के समान है, जो 'UP सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956' के तहत एक मिसकंडक्ट है.

अधिकारी ने इसके जवाब में कहा कि अखबार में उनकी सटीक पोस्ट नहीं छापी गई थी. अगर पूरी टिप्पणी को ध्यान से पढ़ा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि उन्होंने सरकार के कामकाज की कोई आलोचना नहीं की थी और न ही उसके खिलाफ कोई टिप्पणी की थी.

कोर्ट ने कहा- सरकार की आलोचना नहीं की

इसके बाद नवंबर 2019 में उनके दो इंक्रीमेंट रोके गए और निंदा की गई. हालांकि पब्लिक सर्विस ट्रिब्यूनल ने इस सजा के आदेश को रद्द कर दिया था. इसके खिलाफ राज्य सरकार ने हाई कोर्ट का रुख किया. सरकार ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल ने इस मामले में गलत तरीके से हस्तक्षेप क्या. अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को सही मानते हुए सरकार की याचिका खारिज कर दी है. कोर्ट ने कहा कि अधिकारी ने रैली में डॉ. अंबेडकर की गैर-मौजूदगी पर बस टिप्पणी की थी. हमें नहीं समझ आता है कि यह  सरकार की आलोचना कैसे मानी जा सकती है. खासकर तब जब इसमें सरकार या किसी भी नीति का कोई ज़िक्र नहीं था.

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