- ओवैसी बिहार विधानसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद दो और राज्यों में चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं
- असम में ओवैसी ने खुद उम्मीदवार नहीं उतारे लेकिन AIUDF के नेता बदरूद्दीन अजमल के लिए प्रचार कर रहे हैं
- वहीं बंगाल में ओवैसी और हुमायूं कबीर ने मिलकर 50 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है
AIMIM के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार विधानसभा चुनाव में जीत का जो स्वाद चखा है उससे उनके हौसले बुलंद हैं. यही वजह है कि इस बार जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, उनमें से कम से कम दो राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं. हालांकि उन पर बीजेपी की बी टीम होने का टैग लगता रहता है. मगर ओवैसी हमेशा कहते रहे हैं कि भारत का संविधान उन्हें हर जगह चुनाव लड़ने का अधिकार देता है.यह भी उतना ही सच है कि मौजूदा दौर में असदुद्दीन ओवैसी मुसलमानों की बड़ी आवाज के रूप में उभरे हैं और खासकर युवाओं में उनका बहुत क्रेज है. यह भी उतना बड़ा सच है कि अभी हाल में ही बिहार में हुए राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन के उम्मीदवार के लिए वोट करके बीजेपी की बी टीम का टैग उन्होंने उखाड़ फेंका है. बिहार में सीमांचल से ओवैसी के पांच विधायक जीते है और अब उनकी नजर असम और पश्चिम बंगाल पर है.
असम में ओवैसी कर रहे कौन सा प्रयोग?
असम में असदुद्दीन ओवैसी एक अलग तरह का प्रयोग कर रहे हैं. असम में ओवैसी ने एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा है मगर वो वहां प्रचार कर रहे हैं वो भी एआईयूडीएफ के नेता बदरूद्दीन अजमल के लिए. अजमल पिछली बार कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा थे और 16 सीटें जीते थे. मगर कांग्रेस ने इस बार बदरुद्दीन अजमल का साथ छोड़ दिया है यह कहते हुए कि इससे बीजेपी को वोटों का ध्रुवीकरण करने का मौका मिलता है. दरअसल 2024 के लोकसभा चुनाव में बदरूद्दीन अजमल बुरी तरह चुनाव हार गए. उनको कांग्रेस के रकीबुल हुसैन ने 10 लाख वोटों से हराया था. रकीबुल को 14 लाख 71 हजार वोट मिले थे जबकि बदरूद्दीन अजमल को 4 लाख 59 हजार वोट.
असम में बदरूद्दीन ने थामा ओवैसी का साथ
इस हार ने बदरूद्दीन अजमल के रूतबे और हिम्मत को बुरी तरह तोड़ दिया और उनकी मुस्लिम नेता और मौलाना अजमल की छवि को भारी नुकसान पहुंचा. यही वजह है कि इस बार अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए उन्होंने ओवैसी का दामन थामा है और ओवैसी ने भी उन्हें निराश नहीं किया है. ओवैसी असम में लगातार प्रचार कर रहे है ठीक उसी तरह जैसे बिहार में समाजवादी पार्टी का एक भी उम्मीदवार ना होते हुए अखिलेश यादव आरजेडी के उम्मीदवारों के लिए कर रहे थे. बदरूद्दीन अजमल को लगता है कि ओवैसी की लोकप्रियता उनकी नैया पार लगा देंगे.
बंगाल में ओवैसी और हुमायूं कबीर भी साथ
उधर पश्चिम बंगाल में ओवैसी और हुमायूं कबीर साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं. बंगाल में मुस्लिम वोट हमेशा से निर्णायक रहा है चाहे वो वाम दलों के शासन में हो या ममता बनर्जी के कार्यकाल में. यही वजह है कि ओवैसी और हुमायूं कबीर ने यहीं पर अपना फोकस रखा है. दोनों यहां पर 50 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी. मालदा और मुर्शिदाबाद में अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या काफी ज्यादा है. मुर्शिदाबाद में 22 सीटें हैं, जिनमें पिछली बार तृणमूल 20 पर जीती थी, जबकि मालदा में 12 सीटें हैं, जहां भी तृणमूल ही है. ऐसे में अगर वोटों का समीकरण थोड़ा भी बदला, तो असर तृणमूल पर ही पड़ेगा. हुमायूं कबीर का प्रभाव पर मुर्शिदाबाद के कुछ इलाकों में है. वो पहले तृणमूल में ही थे, लेकिन अब पार्टी से अलग होकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं. उनकी पार्टी नई है और संगठन अभी उतना मजबूत नहीं है, यही वजह है कि वो कितना सेंध लगा पाएंगे यह देखना होगा.
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TMC के लिए क्यों टेंशन की बात?
इस बार बंगाल का चुनाव सिर्फ जीत-हार का का नहीं होने वाला. वैसे बंगाल की जनता जिसे जितवाती है उसे कम से कम 200 सीटें देती है. लेकिन इस बार का चुनाव वोटों के बंटवारे का भी होगा. ओवैसी-कबीर गठजोड़ ने अगर थोड़े भी वोट काट लिए, तो तृणमूल के लिए मुश्किल हो सकती है. लेकिन यह तो तय है कि इस बार बंगाल का चुनाव पहले से ज्यादा दिलचस्प अनिश्चित और कांटे का होने वाला है. अब देखना है कि हुमायूं-ओवैसी कुछ कर पाऐंगे या वोट कटवा की भूमिका में रहेंगे.
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