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'पावर'में रहना बखूबी जानते थे अजित पवार, सियासी समीकरण साधने के थे महारथी

अजित पवार पिछले 35 साल से महाराष्ट्र की राजनीति का एक छोर बने हुए थे. चाचा शरद पवार से राजनीति सीखने वाले अजित पवार पृथ्वीराज चव्हाण, उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस की सरकारों में उपमुख्यमंत्री के पद पर रहे.

'पावर'में रहना बखूबी जानते थे अजित पवार, सियासी समीकरण साधने के थे महारथी
नई दिल्ली:

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख अजित पवार की बुधवार सुबह बारामती के पास हुए एक विमान हादसे में मौत हो गई. वो वहां जिला परिषद चुनाव के प्रचार के लिए जा रहे थे. इस दौरान उनका विमान क्रैश लैंडिंग में दुर्घटनाग्रस्त हो गया. पवार के निधन से महाराष्ट्र में शोक की लहर दौड़ गई है. पवार के निधन से महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हुआ है.अपने चाचा और महाराष्ट्र की राजनीति के कद्दावर नेता शरद पवार की छत्रछाया में राजनीति शुरू करने वाले अजित पवार ने अपने अंतिम दिनों में अपनी राहें उनसे अलग कर ली थीं. अजित पवार की छवि पार्टी में एक कुशल संगठनकर्ता की थी. करीब 35 साल के राजनीतिक करियर में अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति में ही सक्रिय रहे. उन्हें बदलते राजनीतिक समीकरणों के साथ खुद को ढालने वाला नेता माना जाता था. उन्होंने पृथ्वीराज चव्हाण, उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस की सरकारों में कुल छह बार उपमुख्यमंत्री का पद संभाला. 

राजनीतिक सफर कहां से शुरू हुआ 

अजित पवार के पिता का नाम अनंतराव पवार था. वो शरद पवार के बड़े भाई थे. लेकिन अजित पवार ने राजनीति का ककहरा चाचा शरद पवार की गोद में सीखा. चाचा की ही तरह अजित ने भी अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत सहकारी आंदोलन से की थी. उनका राजनीतिक जीवन शरद पवार के मार्गदर्शन में ही आगे बढ़ा. साल 1959 में पैदा हुए अजित पवार पहली बार 1991 में बारामती लोकसभा सीट से सांसद चुने गए थे. यह उनका पहला संसदीय चुनाव था. लेकिन शरद पवार के चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया था. दरअसल शरद पवार प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में केंद्रीय मंत्री बनाए गए थे. मंत्री बने रहने के लिए उनका संसद का सदस्य होना जरूरी थी. इसलिए अजित पवार ने यह कुर्बानी दी थी.

बारामती की संसदीय सीट छोड़ने के बाद महाराष्ट्र की राजनीतिक में उनका करियर 1995 में शुरू हुआ. उस साल वो बारामती विधानसभा सीट से महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए. यह वह सीट थी, जहां से शरद पवार कई दशक दशक तक विधायक चुने गए थे. अजित पवार ने इस सीट से 1999, 2004, 2009, 2014 और 2019 में लगातार जीत दर्ज की.

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संगठन पर पकड़ रखने वाला नेता

साल 1999 में शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का गठन किया तो अजित पवार खुद को उनका स्वाभाविक राजनीतिक उत्तराधिकारी मानने लगे. उसी साल अजित पवार को महाराष्ट्र में कांग्रेस की विलास राव देशमुख सरकार में जगह मिली. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर में सिंचाई, ग्रामीण विकास, जल संसाधन और वित्त जैसे अहम विभागों का जिम्मा संभाला. इन जिम्मेदारियों का उपयोग उन्होंने महाराष्ट्र में मजबूत संगठन खड़ा करने में किया. उनका संगठन क्षमता गजब की थी. उन्होंने चाचा की पार्टी एनसीपी में अपने वफादार नेताओं की एक लंबी-चौड़ी फौज तैयार की थी. यह उस समय नजर आई, जब उन्होंने शरद पवार से अपनी राहें अलग कीं. पार्टी के वरिष्ठ नेता उनके साथ नजर आए थे. अजित पवार के इस कद से पवार परिवार में असहजता नजर आती थी. 

शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले 2009 राजनीति में आई थीं. इसके बाद शरद पवार के उत्तराधिकारी को लेकर चर्चा तेज हो गई थी. इसका चरम 2024 के लोकसभा चुनाव में नजर आया. पवार परिवार की राजनीति के गढ़ बारामती लोकसभा सीट पर सुप्रिया सुले और अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार आमने-सामने आ गई थीं. इसमें जीत सुप्रिया सुले को मिली थी. हालांकि बाद में इस चुनाव के लिए अजित पवार ने अफसोस भी जताया था. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह माना था कि उन्हें सुप्रिया के सामने पत्नी को चुनाव नहीं लड़ाना था. बाद में सुनेत्रा पवार को राज्य सभा भेजा गया.

चाचा के फैसले पर जताई असहमति

अजित पवार ने चाचा से असहमति पहली बार तब जताई जब 2004 में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद एनसीपी ने मुख्यमंत्री पद कांग्रेस को दे दिया.इस चुनाव में कांग्रेस ने 69 और एनसीपी ने 71 सीटें जीती थीं.साल 2010 में बनी एनसीपी-कांग्रेस की पृथ्वीराज चाव्हाण सरकार में अजित पवार को उपमुख्यमंत्री बनाया गया था. सिंचाई परियोजनाओं में कथित घोटाले के आरोप में 2012 में उपमुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. हालांकि पवार के इस्तीफे के बाद भी शरद पवार के हस्तक्षेप की वजह से सरकार पर कोई संकट नहीं आया. 

अजित पवार के राजनीतिक गुरु चाचा शरद पवार थे.

अजित पवार के राजनीतिक गुरु चाचा शरद पवार थे.

साल 2019 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अजित पवार और शरद पवार का नाम लिया. इसके बाद अजित पवार ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया. साल 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद जब एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना सरकार बनाने की बातचीत कर रहे थे, इसी दौरान अजित पवार ने देवेंद्र फडणवीस के साथ उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली. यह अजित पवार की पहली बगवात थी, जो उन्होंने चाचा शरद पवार के खिलाफ की थी. लेकिन चाचा के कहने पर वो इस्तीफा देकर उनके पाले में आ गए थे. इसके बाद दिसंबर 2019 में बनी एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना की  महाविकास आघाड़ी सरकार में अजित पवार को फिर उपमुख्यमंत्री बनाया गया. वो तीन साल तक इस पद पर रहे.लेकिन परिवार के अंदर विवाद बढ़ता रहा. 

चाचा के खिलाफ भतीजे की बगावत

महाविकास अघाड़ी की सरकार शिवसेना के एकनाथ शिंदे की बगावत की वजह से गिर गई. इसके बाद शिंदे के नेतृत्व वाली शिव सेना ने बीजेपी के साथ मिलकर जून 2022 में सरकार बनाई. बगावत की यह चिंगारी शिव सेना तक ही नहीं रुकी. जुलाई 2023 में अजित पवार ने भी बगावत कर दी. वो एनसीपी के अधिकांश विधायकों के साथ शिवसेना और बीजेपी की महायुति सरकार में शामिल हो गए. उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया था. 

अजित पवार की इस बगावत ने एनसीपी को दो फाड़ कर दिया. भतीजे ने चाचा को तगड़ा नुकसान पहुंचाया. इससे पवार परिवार की राजनीतिक एकता टूट गई. पार्टी पर कब्जे की लड़ाई चुनाव आयोग तक गई. वहां से फैसला अजित पवार के हक में हुआ. उन्हें पार्टी का नाम और उसका चुनाव चिन्ह मिल गया. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में शरद पवार की एनसीपी अजित पवार की एनसीपी पर बीस साबित हुई. चाचा की पार्टी 10 में से आठ सीटें जीतने में कामयाब रही. लेकिन भतीजे की पार्टी चार में से केवल एक सीट ही जीत पाई. लेकिन उसी साल कराए गए विधानसभा चुनाव में अजित पवार एक बार फिर चाचा पर 20 साबित हुए. एनसीपी को महायुति में 59 सीटें लड़ने के लिए मिली थीं. उसने इनमें से 41 सीटों पर जीत दर्ज की. इसके बाद बनी सरकार ने अजित पवार को एक बार फिर उपमुख्यमंत्री बनाया गया. 

अभी हाल में हुए नगर निकाय चुनाव में पुणे और उसके आसपास के इलाकों में अपना कब्जा बनाए रखने के लिए एनसीपी के दोनों धड़े एक हो गए थे. लेकिन उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा था. इसके बाद ही महाराष्ट्र की राजनीति चाचा-भतीजे के फिर एक होने की चर्चा तेज हो गई थी. लेकिन यह चर्चा सच्चाई बन पाती, उससे पहले ही अजित परिवार चिर निद्रा में सो गए. 

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