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दूषित पानी से मौतों के बाद अब नसों पर हमला, भागीरथपुरा में महिला मरीज़ को गुइलेन-बैरे सिंड्रोम के लक्षण, वेंटिलेटर पर

जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़े और सामुदायिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे अमूल्य निधि का कहना है कि यह अब सिर्फ डायरिया का मामला नहीं रहा, भागीरथपुरा की स्थिति अब सिर्फ शारीरिक बीमारी की नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक संकट की भी है.

दूषित पानी से मौतों के बाद अब नसों पर हमला, भागीरथपुरा में महिला मरीज़ को गुइलेन-बैरे सिंड्रोम के लक्षण, वेंटिलेटर पर
इंदौर:

देश के सबसे साफ शहर कहे जाने वाले इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से अब तक 16 लोगों की मौत हो चुकी है और 1,400 से अधिक लोग बीमार पड़ चुके हैं. कई अब भी अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती हैं. अब इस त्रासदी ने एक और भयावह रूप ले लिया है. भागीरथपुरा की 67 वर्षीय महिला पार्वती बाई कोंडला को गुइलेन-बैरे सिंड्रोम के लक्षण मिले हैं, जिससे यह आशंका बढ़ गई है कि दूषित पानी का असर सिर्फ पेट की बीमारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नसों और शरीर के अंदरूनी तंत्र तक पहुंच गया है.

पार्वती बाई की हालत इस समय बेहद नाजुक है. वे वेंटिलेटर पर हैं, उनकी किडनी काम नहीं कर रही है और डायलिसिस चल रहा है. डॉक्टरों के मुताबिक उनका नर्वस सिस्टम तेजी से कमजोर हो रहा है.परिजनों के अनुसार 27 दिसंबर की रात उन्हें उल्टी और दस्त शुरू हुए. अगले दिन उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन हालत बिगड़ती गई. हाथ-पैर कमजोर पड़ गए, शरीर के रिफ्लेक्स खत्म हो गए और वे खुद से सांस नहीं ले पा रही थीं. 2 जनवरी को उन्हें बॉम्बे हॉस्पिटल रेफर किया गया.

इंदौर के अल्फा ब्रेन स्टडी सेंटर में हुई नर्व कंडक्शन स्टडी (NCS) में गंभीर नर्व डैमेज की पुष्टि हुई. रिपोर्ट में दोनों पैरों की नसों में कमजोरी, सेंसरी नसों के सिग्नल गायब होना और लेट रिस्पॉन्स का न होना सामने आया है, जो तीव्र तंत्रिका सूजन की ओर इशारा करता है.एम्स के एक वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट ने कहा, “यह बीमारी धीरे-धीरे नहीं होती, यह अचानक होती है. अक्सर यह संक्रमण, ज़हर या इम्यून रिएक्शन के बाद होती है. दूषित पानी की स्थिति में यह बेहद चिंताजनक है.”

GBS एक दुर्लभ लेकिन जानलेवा बीमारी है, जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली अपनी ही नसों पर हमला कर देती है. इससे लकवा, सांस रुकना और मौत तक हो सकती है. इलाज महंगा है IVIG इंजेक्शन लगते हैं, जिनकी कीमत लाखों में जाती है.हालांकि स्वास्थ्य विभाग फिलहाल किसी सीधा संबंध मानने से इनकार कर रहा है. CMHO डॉ. माधव हसनानी ने कहा कि गुइलेन-बैरे सिंड्रोम (जीबीएस) यह एक न्यूरोलॉजी बीमारी है, जो अनेक कारणों से हो सकती है वायरस के कारण हो सकती है सिंगल टेस्ट से जानकारी नहीं मिलती क्लीनिकल डायगनोसिस होता है. हमारे संज्ञान में ऐसा कुछ नहीं आया है, उपचार पर हम दैनिक आधार पर ध्यान दे रहे हैं बॉम्बे हॉस्पिटल में 2 रोगी वेंटिलेटर पर है जो अलग जगह से रेफर हो कर आए हैं. जो अस्पताल उपचार कर रहा है उसने इस तरह की कोई जानकारी आज की तारीख में हमारे दफ्तर को नहीं दी है.GBS कई कारणों से हो सकता है. यह एक क्लिनिकल डायग्नोसिस है और हमें अभी ऐसी कोई आधिकारिक रिपोर्ट नहीं मिली है.

उनके इलाज करने वाले डॉक्टर राहुल करोडे ने एनडीटीवी से बताया, “67 साल की पार्वती कोंडला हमारे अस्पताल में 27 दिसंबर को भर्ती हुई थीं. उन्हें एक्यूट गैस्ट्रोएंटराइटिस के साथ एक्यूट किडनी इंजरी भी थी. उनका ब्लड प्रेशर काफी लो था. हमने इलाज शुरू किया, लूज मोशन वाले पार्ट से तो वह रिकवर हो गई थीं लेकिन उनका क्रिएटिनिन बढ़ा हुआ ही था. इसीलिए हमने नर्व कंडक्शन स्टडी (NCS) करवाई क्योंकि उनके रिफ्लेक्सेस डाउन हो गए थे. सारे लक्षण गुइलेन-बैरे सिंड्रोम के थे. हमारे अस्पताल में सुविधाएं सीमित हैं, इसलिए 2 जनवरी को उन्हें बॉम्बे हॉस्पिटल शिफ्ट किया गया. वे भागीरथपुरा से थीं और जो भी निर्देश हमें मिले थे उसके अनुसार हमने प्रशासन को सूचित किया. नर्व कंडक्शन स्टडी में वही बदलाव दिखे जो जीबीएस की ओर इशारा करते हैं, इसलिए उन्हें आगे की जांच और इलाज के लिए हायर सेंटर भेजा गया.”

जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़े और सामुदायिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे अमूल्य निधि का कहना है कि यह अब सिर्फ डायरिया का मामला नहीं रहा, भागीरथपुरा की स्थिति अब सिर्फ शारीरिक बीमारी की नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक संकट की भी है.उन्होंने कहा कि यह मामला अब सिर्फ डायरिया या उल्टी-दस्त का नहीं रहा. यह मेंटल हेल्थ का भी मामला बन चुका है. लोग डर में जी रहे हैं, असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और उनका भरोसा सिस्टम से उठ चुका है.

अमूल्य निधि ने 2019 की CAG रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि सिर्फ भोपाल और इंदौर में ही 5.45 लाख मामले जलजनित बीमारियों के हैं. हर साल हर जिले में कम से कम 50 हजार तक डायरिया और वॉटर-बोर्न बीमारियों के केस सामने आते हैं. अक्टूबर में बड़वानी में 200 लोग बीमार पड़े थे, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया.

उन्होंने कहा कि सरकार कर्ज लेकर पानी उपलब्ध करा रही है, लेकिन बुनियादी हालात बिगड़ते जा रहे हैं. 2019 में पानी की कमी 30 प्रतिशत थी, आज वह 65 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है. लीकेज बढ़ते जा रहे हैं. पानी की ज़रूरत 135 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है, लेकिन दिया जा रहा है सिर्फ 78 लीटर. बाकी लोग कैसे पूरा कर रहे हैं? टैंकर से, बोरवेल से, असुरक्षित स्रोतों से और उसकी कोई निगरानी नहीं है.

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) ने पानी के प्रोजेक्ट के लिए स्पष्ट शर्तें रखी थीं. “एडीबी की शर्त थी कि हर 15 दिन में वॉटर ऑडिट और पानी की गुणवत्ता की जांच होनी चाहिए. ये शर्तें वैकल्पिक नहीं थीं. लेकिन ज़मीन पर उनका पालन नहीं हुआ.”अमूल्य निधि ने मांग की कि सरकार पारदर्शिता दिखाए और स्वास्थ्य आंकड़े सार्वजनिक करे. स्वास्थ्य विभाग को पब्लिक हेल्थ एक्ट के तहत यह बताना चाहिए कि पिछले एक साल में प्रदेश के 52 जिलों में कितनी जलजनित बीमारियां हुईं. यह डाटा जनता का अधिकार है.

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