- आरोपी ने पत्नी पर 49 बार चाकू से हमला कर उसकी हत्या की और छह साल की बेटी को भी मारने की कोशिश की
- ओडिशा हाईकोर्ट ने माना कि अपराध बेहद बर्बर है, पर 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' की कसौटी पर सजा-ए-मौत के लिए काफी नहीं है
- मौत की सजा को ऐसी उम्रकैद में बदला गया है जिसमें कम से कम 35 साल जेल में बिताने होंगे.
चार साल पहले ओडिशा में एक महिला ने अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया था. लेकिन बच्चे के जन्म के सिर्फ तीन दिन बाद उसकी जिंदगी खत्म हो गई. उसके पति ने उस पर चाकू से 49 बार हमला किया और उसकी हत्या कर दी. इसके बाद उसने अपनी छह साल की बेटी का गला काटकर उसे भी मारने की कोशिश की. वारदात के बाद आरोपी मौके से फरार हो गया. बाद में पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया और मुकदमे के बाद निचली अदालत ने उसे मौत की सजा सुनाई.
अब इस मामले में ओडिशा हाईकोर्ट ने मौत की सजा को बदलकर 35 साल की जेल की सजा कर दिया है. इसका मतलब यह है कि दोषी को कुल 35 साल की कैद पूरी किए बिना रिहाई या सजा में किसी तरह की छूट पर विचार नहीं किया जाएगा. जेल में पहले बिताई गई अवधि भी इन 35 सालों में गिनी जाएगी.
सवाल है कि जब अपराध इतना खौफनाक था, पत्नी पर 49 बार चाकू से हमला किया गया और छह साल की बेटी को भी मारने की कोशिश हुई, तो हाईकोर्ट ने मौत की सजा क्यों हटा दी?
'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' का नियम क्या है?
भारत में मौत की सजा हर जघन्य हत्या में नहीं दी जाती. सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि मौत की सजा सिर्फ उन्हीं मामलों में दी जानी चाहिए जो 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' यानी बेहद दुर्लभ मामलों की श्रेणी में आते हैं और जहां उम्रकैद पर्याप्त सजा नहीं मानी जाती.
इसका मतलब यह नहीं है कि अपराध कम गंभीर होना चाहिए. अदालत अपराध की क्रूरता के साथ-साथ अपराधी की परिस्थितियों, उसके पिछले रिकॉर्ड, सुधार की संभावना और दूसरे पहलुओं को भी देखती है.
इसी कसौटी पर हाईकोर्ट ने माना कि यह अपराध बेहद बर्बर और क्रूर था, लेकिन फिर भी इसे मौत की सजा वाले 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' स्तर तक नहीं रखा जा सकता.
बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?
आरोपी की ओर से कहा गया कि हत्या पहले से पूरी योजना बनाकर नहीं की गई थी. बचाव पक्ष ने घरेलू विवाद और अचानक आए गुस्से को घटना की वजह बताया.
यह भी दलील दी गई कि आरोपी का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और जेल में उसका व्यवहार अच्छा रहा है. इसलिए उसके अंदर सुधार की संभावना को देखते हुए मौत की सजा नहीं दी जानी चाहिए.
बचाव पक्ष ने यह तर्क भी दिया कि ज्यादातर चाकू के वार शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों पर होने के बावजूद बहुत गहरे नहीं थे.
अभियोजन पक्ष का क्या कहना था?
अभियोजन पक्ष ने अपराध की गंभीरता और क्रूरता पर जोर दिया. उसका कहना था कि सिर्फ पत्नी की बेरहमी से हत्या ही नहीं हुई, बल्कि आरोपी ने अपनी छह साल की बेटी को भी मारने की कोशिश की.
इसी वजह से अभियोजन ने इसे 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' मामला बताया और मौत की सजा बरकरार रखने की मांग की.
हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया?
दो जजों की पीठ ने माना कि आरोपी का अपराध बेहद गंभीर और बर्बर था. लेकिन अदालत के मुताबिक सिर्फ अपराध की क्रूरता के आधार पर हर मामले में मौत की सजा नहीं दी जा सकती.
अदालत ने आरोपी की परिस्थितियों, उसके पुराने आपराधिक रिकॉर्ड न होने और जेल में उसके आचरण समेत दूसरे पहलुओं को भी ध्यान में रखा. इन बातों को देखते हुए मौत की सजा को बदलकर ऐसी उम्रकैद में तब्दील किया गया जिसमें कम से कम 35 साल जेल में बिताने होंगे.
यानी यह सामान्य उम्रकैद जैसा मामला नहीं है, जिसमें कुछ परिस्थितियों में अपेक्षाकृत जल्दी रिहाई या सजा में छूट की संभावना हो सकती है. इस मामले में 35 साल की न्यूनतम अवधि पूरी होने से पहले सजा में छूट पर विचार नहीं किया जा सकेगा.
अदालत ने बच्चों के भविष्य को भी ध्यान में रखा
इस मामले में आरोपी की पत्नी की मौत और पिता के जेल जाने के बाद दोनों बच्चे लगभग पूरी तरह अपने माता-पिता के सहारे से वंचित हो गए.
अदालत ने कहा कि दोनों बच्चियां बहुत छोटी हैं और उनके भविष्य को सुरक्षित करना जरूरी है. इसी वजह से अदालत ने राज्य को दोनों बेटियों के लिए 10-10 लाख रुपये की अतिरिक्त आर्थिक सहायता देने का निर्देश दिया.
इसके अलावा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से पहले से दिए गए 5 लाख रुपये भी बच्चों के बालिग होने तक सावधि जमा में रखने का निर्देश है.
अदालत ने माना कि पैसे से माता-पिता को खोने का दर्द या बच्चों के जीवनभर रहने वाला मानसिक आघात खत्म नहीं हो सकता. लेकिन आर्थिक सहायता उनके भविष्य को बेहतर तरीके से सुरक्षित करने में मदद कर सकती है.
इस फैसले का सबसे बड़ा मतलब क्या है?
इस मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि अदालत ने अपराध की भयावहता को स्वीकार करने के बावजूद मौत की सजा के लिए तय ऊंची कानूनी कसौटी को लागू किया.
यानी अदालत के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं था कि अपराध कितना क्रूर था. सवाल यह भी था कि क्या यह ऐसा मामला है जिसमें सुधार की कोई संभावना नहीं है और उम्रकैद किसी भी तरह पर्याप्त सजा नहीं होगी.
हाईकोर्ट का निष्कर्ष था कि अपराध बेहद क्रूर होने के बावजूद मौत की सजा के लिए जरूरी 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' कसौटी पूरी तरह संतुष्ट नहीं होती. इसलिए मौत की सजा को 35 साल की न्यूनतम कैद वाली उम्रकैद में बदल दिया गया.
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