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This Article is From Jun 21, 2015

सालों से एक कमरे में बंद युवक की दास्तां ने उठाए कई सवाल

सालों से एक कमरे में बंद युवक की दास्तां ने उठाए कई सवाल
मुंबई: तेजी से भागती दौड़ती, हमेशा चकाचौंध से भरपूर मुंबई। मायानगरी के इस चकाचौंध तले अंधेरा है... संवेदनहीनता, इस जगमग में मुंह छिपाए बैठी है...

नवी मुंबई में कैसे एक अमीर परिवार की ग़रीबी, उसे अकेली सोसायटी में रहने को मजबूर करती है... कैसे वो अपने बीमार बच्चे को सालों से एक कमरे में बांधे रखने को मजबूर होते हैं... राज पटेल की ख़बर से पता लगता है।

अंधेरा, हर तरफ फैली गंदगी, बोरे में लपेटकर, बदन को ढंकने की कोशिश करता 22 साल का राज पटेल... सिर्फ एक वड़ा-पाव खाने की चाहत में उसने हमें फ्लैट में आने दिया... सहमे बच्चे की तरह अपने पिता की हर बात मानता गया। शुरू में तो इस परिवार पर हमें गुस्सा आया, लेकिन जब कहानी की परतें खुलीं... तो समझ नहीं पाए ग़लती किसकी है।

राज की बहन रिया पटेल ने हमें बताया 'मेरा भाई राज स्किट्सफ्रीनीआ से पीड़ित है, इसलिए हम उसे अलग कमरे में रखते थे। क्योंकि कई बार हमें डर लगता था कि वो ज्यादा हिंसक होकर बिल्डिंग से छलांग ना लगा दे। हमने कभी उसको मारा-पीटा नहीं है।'

परिवार के मुखिया हैं ऋषभ पटेल, पहली और दूसरी बीवी से कुल मिलाकर दस बच्चे हैं, किसी ज़माने में गुजरात में बड़ी प्लास्टिक फैक्ट्री थी, बाद में फैक्ट्री और शेयर बाज़ार में लगाया पैसा सब डूब गया। खुद दाने-दाने को मोहताज़ हैं, घर में कमरे कई हैं, लेकिन ना तो बिजली है... ना पानी... वो भी सालों से। जिस बिल्डिंग में रहते हैं उस पर केस चल रहा है, लिहाज़ा सोसायटी को छोड़कर हर कोई चला गया, बचे रह गए ऋषभ और उनके बच्चे।

बड़े शहर में किसी का भी दिल इतना बड़ा नहीं निकला, जो उनके उनकी ख़बर पूछता। रिया पटेल ने हमें बताया, 'हमने कई संस्थाओं से मदद मांगी, लेकिन पहले किसी ने मदद नहीं की, अब जाकर अस्पताल ने राज को भर्ती किया है।'

22 साल की उम्र में 25 किलो वज़न का राज अस्पताल में भर्ती है। एक एनजीओ की शिकायत पर उसे घर से निकाला गया, लेकिन पुलिस का कहना है कि परिवार खुद बदहाली में है, ऐसे में उस पर संगदिली का आरोप ठीक नहीं।

नवी मुंबई पुलिस में ज़ोन-1 के डीसीपी शाहजी उमप का कहना था, 'एक एनजीओ के साथ हमने तहक़ीकात की, लेकिन बंधक किसी को बनाया नहीं था। वहां पर जो घर के मुखिया हैं वो शेयर ट्रेडिंग करते थे, लेकिन पैसा गंवा के बैठे हैं, उनके पास खाने को कुछ नहीं है। हमने बच्चे को छुड़ाया, ये मैं नहीं मानता, घरवालों का कहना है कि वो स्किट्सफ्रीनीआ से पीड़ित है इसलिए हमने उसे इलाज के लिए अस्पताल भेजा। उनके घर में बिजली-पानी नहीं है, इसलिए उन्होंने सोसायटी से मांग की थी लेकिन अभी तक वहां बिजली पानी नहीं है।'

परिवार कहता है कि राज 3 साल से कमरे में अकेला है, एनजीओ का दावा है वो दस साल से अपने घर में बंद था। ख़ैर तहकीकात तो पुलिस को करनी है, हमारे जेहन में एक ही सवाल है कि क्या राज को मनोचिकित्सक की ज़रूरत है या समाज को।

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