
प्रतीकात्मक तस्वीर
नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने गर्भवती पत्नी के प्रति क्रूरता दिखाकर उसे खुदकुशी के लिए मजबूर करने वाले एक व्यक्ति को पांच साल की सजा के मामले में नरम रुख अपनाने से इनकार करते हुए कहा कि उसकी कहानी उन युवा महिलाओं की कहानी से मिलती जुलती है, जो अपने ससुराल में 'अनकही तकलीफों' के कारण अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेती हैं।
न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति शिवकीर्ति सिंह की पीठ ने कहा, 'जीवन को लेकर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और परिस्थितियों के कारण खुदकुशी करने को मजबूर करीब 25 साल की युवती की कहानी उन बहुत सी युवतियों की कहानियों जैसी है जो ससुराल की चारदीवारी के भीतर की अनकही तकलीफों और दिक्कतों के कारण अपनी जिंदगी खत्म कर लेती हैं।'
शीर्ष अदालत ने कर्नाटक के एक व्यक्ति की अपील खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं। इस व्यक्ति ने आईपीसी की धाराओं 498 ए (विवाहित महिला के साथ क्रूरता) और 306 (खुदकुशी के लिए उकसाना) के तहत अपराधों के लिए उसे दोषी ठहराने और पांच साल के कारावास की सजा के उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी। अदालत ने कहा कि इस तरह की महिलाएं अपने ससुराल में 'लंबी और खुशहाल शादीशुदा जिंदगी जीने की आशा से प्रवेश करती हैं, लेकिन उनकी आशा हमेशा लंबी नहीं चलती, ना ही उनकी जिंदगी।'
याचिकाकर्ता और उसके माता पिता को इस मामले में निचली अदालत ने बरी कर दिया था, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट ने बाद में पति को दोषी ठहराया था। पीड़ित ने दोषी से वर्ष 1991 में विवाह किया था और वह अपनी ससुराल में रह रही थी। नवंबर 1993 में व्यक्ति ने पुलिस को सूचना दी थी कि उसकी पत्नी की जहर खाने से मौत हो गई। अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने दोषी के इस स्पष्टीकरण को ठुकराकर सही किया कि उसकी पत्नी ने इसलिए खुदकुशी कर ली क्योंकि उसे उसकी मां के घर नहीं जाने दिया गया।
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है)
न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति शिवकीर्ति सिंह की पीठ ने कहा, 'जीवन को लेकर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और परिस्थितियों के कारण खुदकुशी करने को मजबूर करीब 25 साल की युवती की कहानी उन बहुत सी युवतियों की कहानियों जैसी है जो ससुराल की चारदीवारी के भीतर की अनकही तकलीफों और दिक्कतों के कारण अपनी जिंदगी खत्म कर लेती हैं।'
शीर्ष अदालत ने कर्नाटक के एक व्यक्ति की अपील खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं। इस व्यक्ति ने आईपीसी की धाराओं 498 ए (विवाहित महिला के साथ क्रूरता) और 306 (खुदकुशी के लिए उकसाना) के तहत अपराधों के लिए उसे दोषी ठहराने और पांच साल के कारावास की सजा के उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी। अदालत ने कहा कि इस तरह की महिलाएं अपने ससुराल में 'लंबी और खुशहाल शादीशुदा जिंदगी जीने की आशा से प्रवेश करती हैं, लेकिन उनकी आशा हमेशा लंबी नहीं चलती, ना ही उनकी जिंदगी।'
याचिकाकर्ता और उसके माता पिता को इस मामले में निचली अदालत ने बरी कर दिया था, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट ने बाद में पति को दोषी ठहराया था। पीड़ित ने दोषी से वर्ष 1991 में विवाह किया था और वह अपनी ससुराल में रह रही थी। नवंबर 1993 में व्यक्ति ने पुलिस को सूचना दी थी कि उसकी पत्नी की जहर खाने से मौत हो गई। अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने दोषी के इस स्पष्टीकरण को ठुकराकर सही किया कि उसकी पत्नी ने इसलिए खुदकुशी कर ली क्योंकि उसे उसकी मां के घर नहीं जाने दिया गया।
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है)
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