इलाहाबाद:
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को सुनवाई के लिए एक बड़ी पीठ के पास भेजते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार को इस बात का जवाब देना होगा कि जब क्षेत्र में काम शुरू करने में उसे सालों लग गए तो फिर क्यों वह बार-बार आपात प्रावधान लागू कर भूमि अधिग्रहण करती रही। गौतमबुद्ध नगर के करीब एक दर्जन गांवों में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 3,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाले सैकड़ों किसानों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अमिताव लाला और न्यायमूर्ति अशोक श्रीवास्तव की पीठ ने किसानों को 12 अगस्त तक अदालत से बाहर मामला निपटाने का भी विकल्प दिया। पीठ ने कहा, हम देखते हैं कि राज्य सरकार ने क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण के लिए बार-बार आपात प्रावधान का इस्तेमाल किया। न्यायालय यह जानना चाहेगा कि ऐसा करने के पीछे क्या वजह रही। न्यायालय ने आश्चर्य जताते हुए कहा, क्यों राज्य सरकार को अधिग्रहित भूमि पर काम शुरू करने में महीनों, कभी-कभी सालों लग जाते हैं, जबकि वह आपात स्थिति बताकर भूमि का अधिग्रहण करती है और भूमि मालिकों को आपत्ति उठाने का मौका तक नहीं दिया जाता। इसके अलावा, न्यायालय ने भूमि के इस्तेमाल के उद्देश्य में बदलाव पर भी राज्य सरकार से जवाब मांगा है। औद्योगिक विकास के उद्देश्य से किसानों की भूमि का अधिग्रहण करने के बाद भूमि की प्रकृति बदलकर उसे बिल्डरों को क्यों सौंप दिया जाता है। न्यायालय ने कहा, राज्य सरकार को मामले की अगली सुनवाई के दौरान इन दो बिंदुओं पर संतोषजनक जवाब देना होगा।
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