बिहार में विपक्ष कृषि बिल (Farmers Bills) के मुद्दे पर आक्रामक हो रहा है. विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) का कहना हैं कि NDA सरकार लगातार गरीब और किसान विरोधी फैसले ले रही है. इनको संख्या बल का इतना गुमान है कि बगैर किसानों, उनके संगठनों और राज्य सरकारों से राय-मशवरा किए कृषि क्षेत्र का भी निजीकरण, ठेका प्रथा और कॉर्पोरेटीकरण करने को आतुर है. तेजस्वी ने आरोप लगाया कि संसद में एकतरफ़ा 3 कृषि विधेयकों का पास कराना किसानों का हाथ काटने जैसा है. तेजस्वी ने बिल के विरोध में एक बयान जारी किया है.
तेजस्वी ने अपने बयान में कहा कि नए कृषि कानून का सबसे बड़ा खतरा यह है कि सरकार के हाथ में खाद्यान्न नियंत्रण नहीं रहेगा और मुनाफे के लिये जमाखोरी को बढ़ावा मिलेगा. उन्होंने कहा, "ये विधेयक एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) प्रणाली द्वारा किसानों को प्रदान किए गए सुरक्षा कवच को कमजोर कर देगा और बड़ी कंपनियों द्वारा किसानों के शोषण की स्थिति को जन्म देगा. सरकार के इस फैसले से मंडी व्यवस्था ही खत्म हो जायेगी. इससे किसानों को नुकसान होगा और कॉरपोरेट और बिचौलियों को फायदा होगा."
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उन्होंने कहा, "इस विधेयक में वन नेशन, वन मार्केट की बात कही जा रही है लेकिन वन MSP की बात क्यों नहीं की जा रही? सरकार इसके जरिये कृषि उपज विपणन समितियों (APMC) के एकाधिकार को खत्म करना चाहती है, अगर इसे खत्म किया जाता है तो व्यापारियों की मनमानी बढ़ेगी, किसानों को उपज की सही कीमत नहीं मिलेगी."
तेजस्वी ने आरोप लगाया कि बिहार में APMC प्रणाली 2006 में ध्वस्त कर दी गई थी जिसके फलस्वरुप बिहार के किसान समय के साथ गरीब होते चले गए क्योंकि उन्हे MSP का लाभ मिलना भी बंद हो गया और पलायन करने वालों की संख्या बढती चली गई. उन्होंने कहा कि इस वर्ष नीतीश सरकार के कुल गेहूँ खरीद के लक्ष्य का 1% (.71) से भी कम MSP के मूल्य पर खरीद हुई. उन्होंने पूछा कि नीतीश जी बताएं इससे किसान को कैसे फ़ायदा हुआ?
तेजस्वी के बयान की अन्य अहम बातें:
• 14 साल से यही पॉलिसी बिहार में लागू है और आप देख लीजिए आज क्या हालात है प्रदेश में क्योंकि प्रदेश में MSP ही नहीं है। आज बिहार प्रदेश का किसान मक्कई का MSP 1850 ₹ होने के बावजूद उसे बिचौलियों को 1100₹ में बेचता है. इससे किसान को ही नुक़सान है.
• 2022 तक आय दोगुना करने की बात करने वाले 2020 में ही किसानों को सड़क पर पटकने की पूरी तैयारी कर चुकी है. कहाँ केंद्र सरकार बात करती थी कि कुल लागत का 50% जोड़कर MSP किसानों को दिया जाएगा और कहाँ इतनी धूर्तता से अब MSP ही खत्म किया जा रहा है! इतना बड़ा झूठ मोदी जी ने 2014 के चुनाव प्रचार के वक़्त अन्नदाता किसानों से क्यों बोला?
• यह अध्यादेश कहता है कि बड़े कारोबारी सीधे किसानों से उपज खरीद कर सकेंगे, लेकिन ये यह नहीं बताता कि जिन किसानों के पास मोल-भाव करने की क्षमता नहीं है, वे इसका लाभ कैसे उठाऐंगे?
• सरकार एक राष्ट्र, एक मार्केट बनाने की बात कर रही है, लेकिन उसे ये नहीं पता कि जो किसान अपने जिले में अपनी फसल नहीं बेच पाता है, वह राज्य या दूसरे जिले में कैसे बेच पायेगा. क्या किसानों के पास इतने साधन हैं और दूर मंडियों में ले जाने में खर्च भी तो आयेगा.
• केंद्र ने अब दाल, आलू, प्याज, अनाज और खाद्य तेल आदि को आवश्यक वस्तु नियम से बाहर कर इसकी स्टॉक सीमा समाप्त कर दी है अब कोई कितना भी अपने हिसाब से भंडारण कर सकता है और इस वजह से मार्किट में डिमांड और सप्लाई कॉरपोरेट जगत अपने हिसाब से बनाकर फायदा उठाएगा.
• इस अध्यादेश की धारा 4 में कहा गया है कि किसान को पैसा तीन कार्य दिवस में दिया जाएगा. किसान का पैसा फंसने पर उसे दूसरे मंडल या प्रांत में बार-बार चक्कर काटने होंग. न तो दो-तीन एकड़ जमीन वाले किसान के पास लड़ने की ताकत है और न ही वह इंटरनेट पर अपना सौदा कर सकता है. यही कारण है किसान इसके विरोध में हैं.
• अब पशुधन और बाज़ार समितियाँ किसी इलाक़े तक सीमित नहीं रहेंगी. अगर किसान अपना उत्पाद मंडी में बेचने जाएगा, तो दूसरी जगहों से भी लोग आकर उस मंडी में अपना माल डाल देंगे और किसान को उनकी निर्धारित रक़म नहीं मिल पाएगी और छोटे किसानों को सबसे ज्यादा मार पड़ेगी.
• विवाद सुलझाने के लिए 30 दिन के अंदर समझौता मंडल में जाना होगा. वहां न सुलझा तो धारा 13 के अनुसार एसडीएम के यहां मुकदमा करना होगा. एसडीएम के आदेश की अपील जिला अधिकारी के यहां होगी और जीतने पर किसानों को भुगतान करने का आदेश दिया जाएगा. देश के 85 फीसदी किसान के पास दो-तीन एकड़ जोत है. विवाद होने पर उनकी पूरी पूंजी वकील करने और ऑफिसों के चक्कर काटने में ही खर्च हो जाएगी.
• हमारे देश में 85% लघु किसान हैं, बिहार में तो छोटी और मझली जोत के किसान और भी अधिक है. किसानों के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है यानी यह अध्यादेश बड़ी कम्पनियों द्वारा कृषि उत्पादों की कालाबाज़ारी के लिए लाया गया है. कम्पनियां और सुपर मार्केट अपने बड़े-बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे और बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे." किसान संगठनों का कहना कि इस बदलाव से कालाबाजारी घटेगी नहीं बल्की बढ़ेगी, जमाखोरी बढ़ेगी.
• जो कंपनी या व्यक्ति ठेके पर कृषि उत्पाद लेगा, उसे प्राकृतिक आपदा या कृषि में हुआ नुक़सान से कोई लेना देना नहीं होगा. इसका ख़मियाज़ा सिर्फ़ किसान को उठाना पड़ेगा.
• आवश्यक वस्तु अधिनियम में पहले किसानों पर खाद्य सामग्री को एक जगह जमा कर रखने पर कोई पाबंदी नहीं थी. ये पाबंदी सिर्फ़ कृषि उत्पाद से जुडी व्यावसायिक कंपनियों पर ही थी. अब संशोधन के बाद जमाख़ोरी को रोकने की कोई व्यवस्था नहीं रह जाएगी, जिससे बड़े पूँजीपतियों को तो फ़ायदा होगा, लेकिन किसानों को इसका नुक़सान झेलना पड़ेगा.
• इससे बाहरी या प्राइवेट कारोबारियों को फायदा पहुंचेगा. इस तरह के कानून की मदद से छोटी-छोटी मंडिया पूरी तरह खत्म हो जायेंगी. बड़ी कंपनियां की मनमानी बढ़ेगी और छोटे व्यापारी संकट में आ जायेंगे. कंपनियां किसानों की जमीन पर नियंत्रण करने लगेंगी. कालाबाजरी बढ़ेगी. किसान पूरी तरह से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के दायरे में आ जायेगा.
• इससे किसान और उसकी उपज पर प्राइवेट कंपनियों का कब्जा हो जाएगा और सारा फायदा बड़ी कंपनियों को मिलेगा कृषि उत्पाद मार्केट कानूनों (राज्य APMC Act) किसानों को फ्री व्यापार की सुविधा मिलती है. इससे मंडियां खत्म हो जायेगी. अध्यादेश से मंडी एक्ट केवल मंडी तक ही सीमित कर दिया गया है और मंडी में खरीद-फरोख्त पर शुल्क लगेगा जबकि बाहर बेचने-खरीदने पर इससे छूट मिलेगी.
तेजस्वी ने कहा कि इस तानाशाह सरकार को आम जनता की कोई फ़िक्र नहीं है, किसान मजदूर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही. अगर ये किसानों के हित में रहता तो उनके सहयोगी अकाली दल की मंत्री हरसिमरत कौर मंत्रिमंडल से क्यों इस्तीफा देतीं ? तेजस्वी ने कहा, "मैं सरकार से मांग करता हूँ कि इस किसान विरोधी बिल को तुरंत वापस ले. हमारी पार्टी किसान मजदूर भाइयों के साथ हर कदम साथ खड़ी है और उनके हितों की रक्षा में कोई भी बलिदान देने को तैयार है."
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