एनजीटी ने गंगा के किनारों से 500 मीटर की दूरी तक किसी भी प्रकार के कचरे को फेंकने पर पाबंदी लगा दी है...
- NGT ने गंगा के किनारों से 500 मीटर तक कचरा फेंकने पर पाबंदी लगाई है
- उत्तर प्रदेश सरकार को चमड़ा फैक्टरियों को हटाने के निर्देश दिए गए हैं
- घाटों पर होने वाली गतिविधियों के लिए दिशानिर्देश बनाने को कहा गया है
नई दिल्ली:
देश में सबसे ज़्यादा पूजी जाने वाली गंगा नदी को बचाने के लिए देश की सर्वोच्च हरित अदालत ने नदी के किनारों से 500 मीटर की दूरी तक किसी भी प्रकार के कचरे को फेंकने पर पाबंदी लगा दी है, और नदी को दूषित करने वाले किसी भी शख्स पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा.
राष्ट्रीय हरित पंचाट, यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने उत्तर प्रदेश सरकार को सभी प्रदूषण फैलाने वाली चमड़ा फैक्टरियों को नदी के पास से हटाने के निर्देश दिए हैं, और उत्तराखंड सरकार के साथ मिलकर गंगा और उसकी सहायक नदियों के घाटों पर होने वाली धार्मिक गतिविधियों के लिए भी दिशानिर्देश तैयार करने का आदेश जारी किया है.
गंगा दुनिया की सबसे ज़्यादा प्रदूषित नदियों में से एक है, जिसमें रोज़ाना टनों सीवेज तथा औद्योगिक कचरा फेंका जाता है. बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियों से बिल्कुल साफ जलस्रोत के रूप में शुरू होने वाली गंगा अलग-अलग भीड़-भरे औद्योगिक व गैर-औद्योगिक शहरों से गुज़रती हुई प्रदूषण और करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा ज़रूरत से ज़्यादा प्रयोग के चलते टॉक्सिक कीचड़ में तब्दील हो जाती है.
हिमालय से बंगाल की खाड़ी तक 1,570 मील (लगभग 2,527 किलोमीटर) लम्बी गंगा नदी में बड़े-बड़े शहरों और कस्बों से रोज़ाना फेंके जाने वाले 480 करोड़ लिटर सीवेज में से एक चौथाई से भी कम का ट्रीटमेंट हो पाता है. औद्योगिक नगरी कानपुर में पुलों के नीचे बहती गंगा का रंग गहरा सलेटी हो जाया करता है, जहां खुले नालों में से औद्योगिक कचरा और सीवेज गंगा में गिरता रहता है, और नदी की सतह पर झाग बनता रहता है.
राष्ट्रीय हरित पंचाट, यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने उत्तर प्रदेश सरकार को सभी प्रदूषण फैलाने वाली चमड़ा फैक्टरियों को नदी के पास से हटाने के निर्देश दिए हैं, और उत्तराखंड सरकार के साथ मिलकर गंगा और उसकी सहायक नदियों के घाटों पर होने वाली धार्मिक गतिविधियों के लिए भी दिशानिर्देश तैयार करने का आदेश जारी किया है.
गंगा दुनिया की सबसे ज़्यादा प्रदूषित नदियों में से एक है, जिसमें रोज़ाना टनों सीवेज तथा औद्योगिक कचरा फेंका जाता है. बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियों से बिल्कुल साफ जलस्रोत के रूप में शुरू होने वाली गंगा अलग-अलग भीड़-भरे औद्योगिक व गैर-औद्योगिक शहरों से गुज़रती हुई प्रदूषण और करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा ज़रूरत से ज़्यादा प्रयोग के चलते टॉक्सिक कीचड़ में तब्दील हो जाती है.
हिमालय से बंगाल की खाड़ी तक 1,570 मील (लगभग 2,527 किलोमीटर) लम्बी गंगा नदी में बड़े-बड़े शहरों और कस्बों से रोज़ाना फेंके जाने वाले 480 करोड़ लिटर सीवेज में से एक चौथाई से भी कम का ट्रीटमेंट हो पाता है. औद्योगिक नगरी कानपुर में पुलों के नीचे बहती गंगा का रंग गहरा सलेटी हो जाया करता है, जहां खुले नालों में से औद्योगिक कचरा और सीवेज गंगा में गिरता रहता है, और नदी की सतह पर झाग बनता रहता है.
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