यह ख़बर 18 नवंबर, 2014 को प्रकाशित हुई थी

हिसार से मुकेश सिंह सेंगर : आसान नहीं है सतलोक आश्रम से रिपोर्टिंग करना

हिसार से मुकेश सिंह सेंगर : आसान नहीं है सतलोक आश्रम से रिपोर्टिंग करना

हिसार:

न्यूज चैनलों पर पत्रकारों को संत रामपाल के आश्रम से रिपोर्टिंग करते हुए देखना हर किसी को अच्छा लग रहा होगा, लेकिन हालात इतने आसान नहीं हैं। हिसार से लेकर बरवाला तक पुलिस के कई चेकपोस्ट हैं। आखिरी चेकपोस्ट आश्रम से तीन किलोमीटर दूर है। हर दिन हम सुबह 4-5 बजे के बीच उठते हैं। अपना आई-कार्ड दिखाते हुए आखिरी चेकपोस्ट तक पहुंचते हैं। इसके बाद न तो कोई खुद जा सकता है और न ही कोई गाड़ी जा सकती है।


पुलिस से लड़-झगड़कर हम बैरिकेड के आगे निकलते हैं। एक बार अंदर गए तो पूरे दिन के लिए अंदर, क्योंकि दोबारा पुलिस अंदर जाने नहीं देती। बड़े-बड़े बैग में अपने शूट का सामान लादे हम और हमारे साथी आगे का रास्ता पैदल तय करते हैं। अंदर न तो खाने के लिए कुछ है और न ही पीने के लिए कुछ है, क्योंकि हम लोग सुबह निकलते हैं इसलिए खाना भी नहीं मिलता है। हम लोग अपने साथ जो थोड़ा बहुत बिस्कुट और नमकीन ले जाते हैं, उसी से पूरे दिन का काम चलता है। या फिर किसी को बीच में कहीं से भी कुछ खाना लाने का मौका मिल गया तो सभी पत्रकार मिल-जुलकर खाते हैं। वैसे बाबा के आश्रम वाले चाय और बिस्कुट बार-बार देने की कोशिश करते हैं, लेकिन यहां चाय कोई पत्रकार नहीं पीता, क्योंकि उन्हें पता है कि बाबा को दूध से नहलाने के बाद उसी दूध से यहां चाय बनती है। इसलिए सबको लगता है कि बाबा के लोग जो पानी पिला रहे हैं, कहीं उसकी भी यही कहानी न हो।

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पूरे दिन बाबा रामपाल के लोगों से नोकझोंक भी होती है। वे चाहते हैं कि हम खबर को उनके हिसाब से चलाएं, हमें भी हजारों लोगों की उग्र भीड़ के साथ संयम से रिपोर्टिंग करनी पड़ती है। कई बार बाबा के लोग पत्रकारों को खबर के लिए धमकाते हैं। यहां के हालात देखकर इतना ही कहूंगा कि बाबा के लोग कमांडो सुसाइड बॉमबर की तरह हैं, जो इतने कड़े हालात में भी मरने मारने को तैयार हैं। आश्रम का बिजली-पानी कटा हुआ है, इसलिए कई लोग कई दिनों से नहाए नहीं हैं। पास खड़े होने पर इसका एहसास अपने आप हो जाता है। कोई बाबा रामपाल को मजाक के दौर पर रुमपाल कहता है तो कोई बरवाला को बगदादी।

मजाक के बीच अचानक पुलिस एक्शन में आती है तो हम भी अपना काम शुरू कर देते हैं। कई बार भीड़ पुलिस को खदेड़ती है तो हम भी खेतों की ओर भागते हैं, क्योंकि यहां की पुलिस की लाठियों से ज्यादा खतरा बाबा रामपाल के लोगों से है, जो हथियारों के साथ तैयार हैं। हमारे पास फोन या कैमरे की बैटरी चार्ज करने के सीमित संसाधन होते हैं और उसी में हमें समय देर रात तक गुजारना होता है। यहां अधिकतर स्थानीय लोग बाबा की खिलाफ हैं, लेकिन पुलिस उन्हें नजदीक भटकने भी नहीं देती। रिपोर्टिंग के बाद हम देर रात अपने होटल की ओर बढ़ते हैं और सुबह-सुबह फिर निकल पड़ते हैं, इस अनोखे बाबा के आश्रम की ओर...