विज्ञापन
This Article is From Sep 15, 2019

'मॉब लिंचिंग' पर कविता लिखकर सुर्खियों में आए कवि ने बताई आखिर उनकी यह कविता क्यों हो रही है वायरल ?

अपनी कविता के रस के बारे में बताते हुए नवीन ने कहा कि यह भयानक रस पर लिखी गई कविता है. एक ऐसा भय जो उनके अंदर था और उन्हें लगता है कि यह भय आज हर किसी के अंदर व्याप्त है.

IIT दिल्ली से इंजीनियर हैं नवीन चौरे

नई दिल्ली:

IIT दिल्ली से इंजीनियरिंग करने वाले नवीन चौरे की मॉब लिंचिंग पर लिखी एक कविता सोशल मीडिया पर इन दिनों खूब वायरल हो रही है. नवीन चौरे ने इस कविता को न केवल लिखा है बल्कि इसका खुद पाठ भी किया है. नवीन ने अपनी इस कविता को लेकर NDTV से खास बातचीत की. NDTV से बात करते हुए नवीन ने न केवल अपनी कविता के बारे में बात की है बल्कि काव्य से अपने लगाव की बारे में भी बताया. अपनी कविता के बारे में बताते हुए नवीन ने कहा कि यह भयानक रस पर लिखी गई कविता है. एक ऐसा भय जो उनके अंदर था और उन्हें लगता है कि यह भय आज हर किसी के अंदर व्याप्त है. नवीन की इस बात की पुष्टि उनकी कविता की शुरुआती लाइनें भी करती हैं, 

हिन्दी में गुनना-बुनना मुमकिन नहीं रह गया, सो हश्र तो यही होना था...

इक सड़क पर खून है
तारीख कोई जून है
एक उंगली है पड़ी 
और उसपे
जो नाखून है
नाखून पे है इक
निशां

किताब छप जाने से कुछ नहीं होता, छपते रहने से होता है : सुरेंद्र मोहन पाठक

IIT दिल्ली से बीटेक करने वाले नवीन ने कहना है कि सरकार कभी भी लोगों को विरोध करने से मना नहीं करती. सरकार के आसपास के लोग आम जनता में भय पैदा करते हैं. उन्होंने कहा कि यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी है कि बहुसंख्यक के बीच में अल्पसंख्यक हमेशा डरा हुआ महसूस करता है. पता नहीं जिस सेक्युलरिज़्म की बात हम कर रहे थे वो कहां चला गया है. महात्मा गांधी ने जो वादा था कि वे सेक्युलर इंडिया देंगे तो वह सेक्युलर इंडिया है कहां? भीमराव अंबेडरकर का वादा था सेक्युलर इंडिया देने का, वो कहां है? अंबेडकर हमारा संविधान है. वह मरे नहीं है. उनका अस्तित्व अभी भी है. यदि संविधान सर्वोपरि था तो वह संविधान कहां है? हालांकि नवीन चौरे ने कहा कि वह किसी खास माइनॉरिटी की बात नहीं कर रहे हैं. उन्होंने कहा, 'यह एक तथ्य है कि माइनॉरिटी चाहे जहां भी रहे वह हमेशा डरी हुई रहती है. यह केवल भारत की बात नहीं है पूरी दुनिया में ऐसा होता है, लेकिन मेरी शिकायत इससे है कि जब आप कानून हाथ में लेते हैं. हमारे पास संविधान है, कानून है, पूरी व्यवस्था है फिर कानून को हाथ में लेने की क्या ज़रूरत है? अगर ऐसा है तो फिर जंगल में चल कर रहते हैं. वहां कोई हिरण नहीं बोलेगा कि मुझे शेर ने मार दिया, क्योंकि वहां जंगल का कानून है. अगर यह सही तो फिर जंगल का कानून लागू कर दीजिए.'

पुस्तक समीक्षाः दलित विमर्श को आगे बढ़ाता संवाद है 'ओमप्रकाश वाल्मीकि का अंतिम संवाद'

मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं के विरोध में युवाओं के उठ खड़े होने पर नवीन ने कहा कि अभी और लोगों को खड़े होने के जरूरत है. उन्होंने कहा, 'कोई दुनिया को नहीं बचा सकता है. हमें ही इसे बदलना होगा. अब कोई अवतार नहीं लेने. हमें ही छोटा-छोटा योगदान देने होंगे.' IIT करने के बाद काव्य के क्षेत्र में आने के सवाल पर नवीन चौरे ने कहा, 'आपको कविता करने की जूझती नहीं है. वह आपको मजबूर कर देती है. जब आपके अंदर कुछ भर जाता है तो कविता लिख जाती है.' परिवार में किसी साहित्यकार के होने के सवाल पर नवीन ने कहा, 'मैं बहुत छोटे घर से आता हूं. इसलिए मेरे घर में कविता की होने की कोई संभावना ही नहीं है. हालांकि मेरी बड़ी बहन है कविताएं करती थीं. मेरे तीन बहन हैं. उनमें से सबसे बड़ी कविताएं लिखती हैं. उन्हीं से ही मेरे अंदर यह भाव आया है.' 

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे: