
क्या भारत सरकार ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के परिवारवालों की 20 साल तक जासूसी करवाई थी? क्या भारत का खुफिया विभाग इस जासूसी में शामिल था? इन खबरों को खुफिया विभाग ने और जिस मंत्रालय के तहत वो आता है, यानी गृह मंत्रालय ने सिरे से नकार दिया है।
ये जासूसी 1948-1968 के बीच हुई थी। नेहरू की मौत 27 मई को हुई थी यानी ये जासूसी उनकी मौत के चार साल बाद तक चलती रही थी।
खुफिया विभाग के अनुसार उसने नेताजी के मुतालिक कोई फाइल डी-क्लासिफाई नहीं की, हां ये जरूर है कि उनके अनऑफिसियल नोट्स जिन्हें UO कहा जाता है, वह अलग-अलग विभागों में जाते हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, 'ये नोट्स कैबिनेट सचिवालय जाते हैं। वहां ये शायद किन्हीं जनरल फाइल्स से मिल गए और उस विभाग ने इन्हें डी-क्लासिफाई करार कर नेशनल आर्काइव्स में भेज दिया होगा।'
उनके मुताबिक इंटेलिजेंस ब्यूरो कभी अपनी फाइल्स को सार्वजनिक नहीं करती। नेशनल आर्काइव्स में जो दस्तावेज़ भेजे जाते हैं वह अपने आप नियम के अनुसार डी क्लासीफाई हो जाते हैं। सिर्फ सीक्रेट और टॉप सीक्रेट दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं किये जाते।
दरअसल 18 अगस्त 1945 को जापान से एक विमान हादसे के बाद से नेताजी का कुछ पता नहीं चला है। सिर्फ उनके समर्थक कई सालों तक मानते रहे कि वो ज़िंदा हैं। कई बार उनके देखे जाने की खबरें भी आती रहीं, लेकिन सुभाष चन्द्र की मौत पर पर्दा पड़ा रहा। किसी भी सरकार ने उनकी मौत से जुड़े दस्तावेज़ों को सार्वजनिक नहीं होने दिया।
पिछले साल गृह मंत्रालय ने राज्यसभा में प्रश्न काल के दौरान बताया था कि सरकार के पास 89 फाइल्स हैे जिनमें से 29 विदेश मंत्रालय के पास हैं और 60 प्रधानमंत्री कार्यालय में और जो फाइल्स प्रधानमंत्री कार्यालय में थी उनमें से दो फाइल्स को नेशनल आर्काइव्स में भेजा गया था।
'इंडियाज बिगेस्ट कवर अप' के नाम से किताब लिखने वाले अनुज धर का कहना है कि नेताजी से जुड़े दस्तावेज़ों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
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