
प्राइवेट अस्पतालों में EWS यानी आर्थिक तौर पर कमजोर तबके से आने वाले मरीजों के बेड अगर 20 फीसदी से ज्यादा खाली रह जाते हैं तो सरकार को ये मंजूर नहीं होगा।
दरअसल दिल्ली के 41 प्राइवेट अस्पतालों में EWS मरीजों के मुफ्त इलाज के लिए 623 बेड हैं जिनमें ज्यादातर 30 से 40 फीसदी ही मरीजों को मिल पाते हैं। ऐसे मरीजों को भर्ती करने में प्राइवेट अस्पताल मीनमेख निकाल कर आनाकानी करते हैं, लिहाजा सरकार ने तय किया है कि अब सरकारी अस्पताल भी मरीजों को रेफर कर सकेंगे।
दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग 85 पेशेंट वेलफेयर ऑफिसर भी नियुक्त करेगा जो प्राइवेट अस्पतालों पर नज़र रखेंगे।
41 अस्पतालों के अलावा सरिता विहार के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में EWS मरीजों के 239 बेड हैं, जिनमें 90 फीसदी इस वजह से खाली रहते हैं कि बेड तो मिल जाता है पर इलाज के पैसे मरीज़ को देने होते हैं। ये मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है पर जबतक फैसला नहीं आ जाता राज्य सरकार ने यहां दवा दुकान खोलने का फैसला किया है जहां गरीब मरीजों को दवाएं 80 परसेंट डिस्काउंट पर मिलेंगी।
EWS पेशेंट मॉनिटरिंग कमेटी के सदस्य अशोक अग्रवाल ने कहा कि सरकार ने यहां तक फैसला लिया है कि जो लोग अपोलो में दवा और बाकी खर्च नहीं उठा सकते, उनका खर्च भी वही वहन करेगी।
सरकार के मुताबिक EWS कोटे के बेड खाली रखकर निजी अस्पताल सालाना करीब 75 करोड़ की कमाई करते हैं। इसकी एक अहम वजह मरीजों को अपने हक की सही जानकारी नहीं मिलना भी है। अशोक अग्रवाल बताते हैं कि किसी गरीब के पास कोई भी डॉक्यूमेंट ना हो तो वो डिक्लेरेशन फॉर्म भर कर दे दे। काफी है। और ये फॉर्म भी प्राइवेट अस्पताल देगा।
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