
भोपाल:
पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने सोमवार को कहा कि भूमि विधेयक के खिलाफ कांग्रेस का अभियान जारी रहेगा क्योंकि यह 'किसान विरोधी' है। उन्होंने कहा, सभी दलों की सहमति से पारित भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के 'किसान समर्थक प्रावधानों को शिथिल कर दिया गया है।'
रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस दावे को 'पूरी तरह से बकवास' बताया कि 2013 के कानून के तहत अस्पतालों, स्कूलों और सड़कों आदि के लिए जमीन का अधिग्रहण संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि रक्षा परियोजनाओं सहित सरकार के लिए जमीन अधिग्रहित करने पर कोई रोक नहीं थी।
रमेश ने भोपाल में संवाददाताओं से कहा, 'हम बिना सर्वदलीय बैठक बुलाए मोदी सरकार द्वारा अध्यादेश के जरिए 2013 के भूमि कानून में किए गए संशोधनों के खिलाफ हैं, जबकि तथ्य यह है कि यह सभी दलों की सहमति से पारित हुआ था।' वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा, 'मौजूदा परिदृश्य में, विधेयक का राज्यसभा में पारित होना कठिन है क्योंकि सपा, बसपा, जेडीयू, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और यहां तक कि एनडीए की सहयोगी शिवसेना व अकाली दल भी इसके विरोध में हैं।' उन्होंने कहा कि कांग्रेस पांच कारणों से इन संशोधनों का विरोध कर रही है।
उन्होंने कहा कि निजी कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण के मामले में 80 प्रतिशत किसानों से सहमति हासिल करना और पीपीपी (सार्वजनिक निजी भागीदारी) के जरिए कार्यान्वित होने वाली परियोजनाओं के मामले में 70 प्रतिशत सहमति के प्रावधान को विधेयक में शिथिल कर दिया गया है।
कांग्रेस नेता रमेश ने दावा किया कि मौजूदा विधेयक में निजी परियोजनाओं के लिए सामाजिक प्रभाव आकलन के प्रावधानों को भी शिथिल कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि 2013 के कानून में एक प्रावधान था कि अगर अधिग्रहित भूमि का पांच साल के अंदर उपयोग नहीं होता है तो इसे वापस मालिक को लौटा दिया जाएगा। लेकिन 2014 के भूमि विधेयक में इसे हटा दिया गया है।
रमेश ने दावा किया कि मुख्य सड़क पर के दोनों ओर एक किलोमीटर तक भूमि के अधिग्रहण का प्रावधान निजी कंपनियों की मदद के इरादे से लाया गया है और कांग्रेस इसके खिलाफ है, क्योंकि यह अव्यावहारिक है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की मांग 2013 के भूमि कानून को पूरी तरह से लागू करने की है और वह इसमें कोई बदलाव स्वीकार नहीं करेगी।
रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस दावे को 'पूरी तरह से बकवास' बताया कि 2013 के कानून के तहत अस्पतालों, स्कूलों और सड़कों आदि के लिए जमीन का अधिग्रहण संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि रक्षा परियोजनाओं सहित सरकार के लिए जमीन अधिग्रहित करने पर कोई रोक नहीं थी।
रमेश ने भोपाल में संवाददाताओं से कहा, 'हम बिना सर्वदलीय बैठक बुलाए मोदी सरकार द्वारा अध्यादेश के जरिए 2013 के भूमि कानून में किए गए संशोधनों के खिलाफ हैं, जबकि तथ्य यह है कि यह सभी दलों की सहमति से पारित हुआ था।' वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा, 'मौजूदा परिदृश्य में, विधेयक का राज्यसभा में पारित होना कठिन है क्योंकि सपा, बसपा, जेडीयू, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और यहां तक कि एनडीए की सहयोगी शिवसेना व अकाली दल भी इसके विरोध में हैं।' उन्होंने कहा कि कांग्रेस पांच कारणों से इन संशोधनों का विरोध कर रही है।
उन्होंने कहा कि निजी कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण के मामले में 80 प्रतिशत किसानों से सहमति हासिल करना और पीपीपी (सार्वजनिक निजी भागीदारी) के जरिए कार्यान्वित होने वाली परियोजनाओं के मामले में 70 प्रतिशत सहमति के प्रावधान को विधेयक में शिथिल कर दिया गया है।
कांग्रेस नेता रमेश ने दावा किया कि मौजूदा विधेयक में निजी परियोजनाओं के लिए सामाजिक प्रभाव आकलन के प्रावधानों को भी शिथिल कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि 2013 के कानून में एक प्रावधान था कि अगर अधिग्रहित भूमि का पांच साल के अंदर उपयोग नहीं होता है तो इसे वापस मालिक को लौटा दिया जाएगा। लेकिन 2014 के भूमि विधेयक में इसे हटा दिया गया है।
रमेश ने दावा किया कि मुख्य सड़क पर के दोनों ओर एक किलोमीटर तक भूमि के अधिग्रहण का प्रावधान निजी कंपनियों की मदद के इरादे से लाया गया है और कांग्रेस इसके खिलाफ है, क्योंकि यह अव्यावहारिक है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की मांग 2013 के भूमि कानून को पूरी तरह से लागू करने की है और वह इसमें कोई बदलाव स्वीकार नहीं करेगी।
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