
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह (फाइल फोटो)
नई दिल्ली:
नरेन्द्र मोदी के तौर पर बीजेपी ने देश को पहला ओबीसी प्रधानमंत्री दिया। अमित शाह के इस दावे पर राजनीतिक विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इसे मोटा झूठ करार दिया है। पार्टी प्रवक्ता राज बब्बर ने अमित शाह पर तंज कसते हुए कहा कि पहले वे सूबेदार थे, अब पार्टी अध्यक्ष हैं। उनकी राजनीतिक जानकारी पर तो मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा लेकिन ये मोटा झूठ है।
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी ने इसे बीजेपी अध्यक्ष का स्तरहीन बयान कहा है। बीजेपी पर हमला करते हुए उन्होंने कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री को 125 करोड़ लोगों का प्रधानमंत्री नहीं बल्कि पहले एक धर्म का प्रधानमंत्री बना दिया। उससे भी काम नहीं चला तो एक जाति का प्रधानमंत्री बना दिया। फिर एक वर्ग का प्रधानमंत्री बना दिया है। ये बीजेपी की बौखलाहट और कम होती लोकप्रियता की निशानी है। बीजेपी ऐसा बिहार चुनाव को ध्यान में रख कर रही है। जबकि देश का प्रधानमंत्री पूरे देश का होता है न की किसी जाति का।
दरअसल अमित शाह के दावे पर विपक्षी पार्टियां इसलिए भड़की हैं क्योंकि देश में पचास फीसदी से ज़्यादा आबादी ओबीसी की है। ऐसे में ये सीधा सीधा राजनीति नफ़ा नुक्सान से जुड़ा मुद्दा है। बिहार में अगले कुछ महीने में चुनाव होने हैं जिसमें ओबीसी वोट बैंक पर सबकी नज़र है।
बिहार की राजनीति की धुरी ही जाति समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती है। बीजेपी की कोशिश ओबीसी वोट बैंक को पुख़्ता करने की है। बीजेपी ऐसा कर पाती है तो इससे लालू यादव और नीतीश कुमार को नुक्सान होगा। इसलिए सबसे पहले और सबसे तीखी प्रतिक्रिया जेडीयू और आरजेडी की तरफ से आयी। लालू ने कहा कि पहले ओबीसी पीएम देवेगौड़ा थे जिनको बनाने में उनकी भूमिका थी। नीतीश ने ये कह कर अपनी भड़ास निकाली कि पीएम को सिर्फ ओबीसी का बताने से कुछ नहीं होगा। देखना होगा कि वे ओबीसी के लिए करते क्या हैं। नीतीश ने मौक़े का फायदा उठाते हुए मांग की कि जाति आधारित जनगणना की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए। उसे केन्द्र सरकार दबा कर क्यों बैठी है।
जेडीयू के महासचिव केसी त्यागी ने बीजेपी को मौक़ापरस्त राजनीतिक पार्टी बताया। कहा कि मोदी कभी विकास पुरुष हो जाते हैं, कभी हिंदू हृदय सम्राट तो कभी ओबीसी। पार्टी पल पल उनका रंग बदल देती है।
नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव के पहले भी कई मंचों से खुद को ओबीसी बता चुके हैं। ज़ाहिर है उसका फायदा भी उनको मिला और यूपी और बिहार जैसे राज्यों की ज़्यादातर सीटें पार्टी ने जीती। विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी अपनी इस क़ामयाबी को दोहराना चाहती है। लिहाज़ा मोदी को पहला ओबीसी पीएम बता रही है। जाति आधारित राजनीति तो हर पार्टी करती है। ख़ुद नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना कर महादलित वोट बैंक को पुख़्ता करने की कोशिश की थी। हालांकि दांव उल्टा पड़ गया और मांझी नीतीश की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल साबित हुए। लेकिन अब जबकि अमित शाह ओबीसी के सहारे बीजेपी की नैया पार कराने की कोशिश में जुटे दिख रहे हैं, कई विपक्षी पार्टियों को ख़्याल आ रहा है कि पीएम पद को जातिगत राजनीति से दूर रखना चाहिए।
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी ने इसे बीजेपी अध्यक्ष का स्तरहीन बयान कहा है। बीजेपी पर हमला करते हुए उन्होंने कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री को 125 करोड़ लोगों का प्रधानमंत्री नहीं बल्कि पहले एक धर्म का प्रधानमंत्री बना दिया। उससे भी काम नहीं चला तो एक जाति का प्रधानमंत्री बना दिया। फिर एक वर्ग का प्रधानमंत्री बना दिया है। ये बीजेपी की बौखलाहट और कम होती लोकप्रियता की निशानी है। बीजेपी ऐसा बिहार चुनाव को ध्यान में रख कर रही है। जबकि देश का प्रधानमंत्री पूरे देश का होता है न की किसी जाति का।
दरअसल अमित शाह के दावे पर विपक्षी पार्टियां इसलिए भड़की हैं क्योंकि देश में पचास फीसदी से ज़्यादा आबादी ओबीसी की है। ऐसे में ये सीधा सीधा राजनीति नफ़ा नुक्सान से जुड़ा मुद्दा है। बिहार में अगले कुछ महीने में चुनाव होने हैं जिसमें ओबीसी वोट बैंक पर सबकी नज़र है।
बिहार की राजनीति की धुरी ही जाति समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती है। बीजेपी की कोशिश ओबीसी वोट बैंक को पुख़्ता करने की है। बीजेपी ऐसा कर पाती है तो इससे लालू यादव और नीतीश कुमार को नुक्सान होगा। इसलिए सबसे पहले और सबसे तीखी प्रतिक्रिया जेडीयू और आरजेडी की तरफ से आयी। लालू ने कहा कि पहले ओबीसी पीएम देवेगौड़ा थे जिनको बनाने में उनकी भूमिका थी। नीतीश ने ये कह कर अपनी भड़ास निकाली कि पीएम को सिर्फ ओबीसी का बताने से कुछ नहीं होगा। देखना होगा कि वे ओबीसी के लिए करते क्या हैं। नीतीश ने मौक़े का फायदा उठाते हुए मांग की कि जाति आधारित जनगणना की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए। उसे केन्द्र सरकार दबा कर क्यों बैठी है।
जेडीयू के महासचिव केसी त्यागी ने बीजेपी को मौक़ापरस्त राजनीतिक पार्टी बताया। कहा कि मोदी कभी विकास पुरुष हो जाते हैं, कभी हिंदू हृदय सम्राट तो कभी ओबीसी। पार्टी पल पल उनका रंग बदल देती है।
नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव के पहले भी कई मंचों से खुद को ओबीसी बता चुके हैं। ज़ाहिर है उसका फायदा भी उनको मिला और यूपी और बिहार जैसे राज्यों की ज़्यादातर सीटें पार्टी ने जीती। विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी अपनी इस क़ामयाबी को दोहराना चाहती है। लिहाज़ा मोदी को पहला ओबीसी पीएम बता रही है। जाति आधारित राजनीति तो हर पार्टी करती है। ख़ुद नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना कर महादलित वोट बैंक को पुख़्ता करने की कोशिश की थी। हालांकि दांव उल्टा पड़ गया और मांझी नीतीश की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल साबित हुए। लेकिन अब जबकि अमित शाह ओबीसी के सहारे बीजेपी की नैया पार कराने की कोशिश में जुटे दिख रहे हैं, कई विपक्षी पार्टियों को ख़्याल आ रहा है कि पीएम पद को जातिगत राजनीति से दूर रखना चाहिए।
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