
अहमदाबाद:
गुजरात में कानून व्यवस्था स्थानीय निकायों के चुनाव करवाने के लिए ठीक नहीं है, ऐसा कहते हुए राज्य चुनाव आयोग ने राज्य में अक्टूबर नवंबर में होनेवाले स्थानीय निकायों के चुनाव तीन महिने के लिए टाल दिये हैं।
गुजरात में अहमदाबाद, सूरत समेत 6 महानगरपालिका, 56 नगरपालिका, 230 तालुका पंचायत और 31 ज़िला पंचायत के चुनाव अक्टूबर नवंबर में होने थे। अब इनकी मियाद खत्म होने के बाद इन सभी में एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त करने के लिए कार्रवाई होगी।
इस फैसले से कांग्रेस सबसे ज्यादा मायूस है। माहौल ठीक नहीं होने के पीछे चुनाव आयोग का इशारा गुजरात में पिछले दो महीने से चल रहे पाटीदार आरक्षण आंदोलन की ओर था। कांग्रेस को ये लगने लगा था कि भाजपा के मज़बूत वोटबैंक कहे जानेवाले पाटीदार अगर सरकार से खफा हैं और अगर भाजपा को वोट नहीं देंगे तो इसका फायदा सीधा कांग्रेस को हो सकता था। ऐसे में कांग्रेस चुनाव टालने को भाजपा की चाल बता रही है। उसका आरोप है कि चुनावों में हार के डर से भाजपा ने चुनाव टाले हैं। कांग्रेस का आरोप ये भी है कि अगर गुजरात के स्थानीय चुनावों में भाजपा की हार होती तो उसका असर सीधा बिहार के चुनावों पर पड़ सकता था इसीलिए भाजपा ने चुनाव टाले हैं। अब समय पर चुनाव करवाने के लिए कांग्रेस ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने का फैसला किया है।
सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, भाजपा का विरोध कर रहे पाटीदार आंदोलन से जुड़े नेता भी इस फैसले से मायूस हैं। पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल ने एक संदेश देकर कहा कि सरकार हार के डर से ये चुनाव टाल रही है। सिर्फ 25 और 26 अगस्त को ही राज्य में हिंसा हुई थी तो कानून व्यवस्था कैसे बिगड़ गई। उन्होंने ये भी कहा कि भाजपा कह रही है कि पाटीदार वोटों से चुनाव में कोई फर्क नहीं पड़ेगा तो वो चुनाव करवाकर देख लें।
लेकिन इस बीच भाजपा ने कहा है कि कांग्रेस पिछले 25 साल से राज्य में सत्ता से बाहर है इसलिए सत्ता में आने के लिए ख्वाब देख रही है। लेकिन जिस तरह से पिछले 25 सालों से कांग्रेस को लोगों ने सत्ता से दूर रखकर भाजपा का साथ दिया है, वैसे ही इस बार भी भाजपा का साथ देगी। कोंग्रेस के शासनकाल में भी कई बार चुनाव टले हैं, इसलिए भाजपा पर आरोप लगाना ठीक नहीं है।
लेकिन जानकार मानते हैं कि अभी के माहौल में अगर चुनाव होते हैं तो भाजपा को अपने सबसे विश्वस्त वोटबैंक पटेलों का विरोध झेलना पड़ सकता है और नतीजों पर इसका असर भी पड़ सकता है। अगर किसी वजह से भाजपा हारी तो इसका असर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के छवि पर भी पड़ सकता है क्योंकि आखिर गुजरात उनका अपना गृहराज्य है और अगर यहां नतीजे विपरीत आते हैं तो उसकी चर्चा ज़रूर होगी।
गुजरात में अहमदाबाद, सूरत समेत 6 महानगरपालिका, 56 नगरपालिका, 230 तालुका पंचायत और 31 ज़िला पंचायत के चुनाव अक्टूबर नवंबर में होने थे। अब इनकी मियाद खत्म होने के बाद इन सभी में एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त करने के लिए कार्रवाई होगी।
इस फैसले से कांग्रेस सबसे ज्यादा मायूस है। माहौल ठीक नहीं होने के पीछे चुनाव आयोग का इशारा गुजरात में पिछले दो महीने से चल रहे पाटीदार आरक्षण आंदोलन की ओर था। कांग्रेस को ये लगने लगा था कि भाजपा के मज़बूत वोटबैंक कहे जानेवाले पाटीदार अगर सरकार से खफा हैं और अगर भाजपा को वोट नहीं देंगे तो इसका फायदा सीधा कांग्रेस को हो सकता था। ऐसे में कांग्रेस चुनाव टालने को भाजपा की चाल बता रही है। उसका आरोप है कि चुनावों में हार के डर से भाजपा ने चुनाव टाले हैं। कांग्रेस का आरोप ये भी है कि अगर गुजरात के स्थानीय चुनावों में भाजपा की हार होती तो उसका असर सीधा बिहार के चुनावों पर पड़ सकता था इसीलिए भाजपा ने चुनाव टाले हैं। अब समय पर चुनाव करवाने के लिए कांग्रेस ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने का फैसला किया है।
सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, भाजपा का विरोध कर रहे पाटीदार आंदोलन से जुड़े नेता भी इस फैसले से मायूस हैं। पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल ने एक संदेश देकर कहा कि सरकार हार के डर से ये चुनाव टाल रही है। सिर्फ 25 और 26 अगस्त को ही राज्य में हिंसा हुई थी तो कानून व्यवस्था कैसे बिगड़ गई। उन्होंने ये भी कहा कि भाजपा कह रही है कि पाटीदार वोटों से चुनाव में कोई फर्क नहीं पड़ेगा तो वो चुनाव करवाकर देख लें।
लेकिन इस बीच भाजपा ने कहा है कि कांग्रेस पिछले 25 साल से राज्य में सत्ता से बाहर है इसलिए सत्ता में आने के लिए ख्वाब देख रही है। लेकिन जिस तरह से पिछले 25 सालों से कांग्रेस को लोगों ने सत्ता से दूर रखकर भाजपा का साथ दिया है, वैसे ही इस बार भी भाजपा का साथ देगी। कोंग्रेस के शासनकाल में भी कई बार चुनाव टले हैं, इसलिए भाजपा पर आरोप लगाना ठीक नहीं है।
लेकिन जानकार मानते हैं कि अभी के माहौल में अगर चुनाव होते हैं तो भाजपा को अपने सबसे विश्वस्त वोटबैंक पटेलों का विरोध झेलना पड़ सकता है और नतीजों पर इसका असर भी पड़ सकता है। अगर किसी वजह से भाजपा हारी तो इसका असर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के छवि पर भी पड़ सकता है क्योंकि आखिर गुजरात उनका अपना गृहराज्य है और अगर यहां नतीजे विपरीत आते हैं तो उसकी चर्चा ज़रूर होगी।
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