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एम्बुलेंस से पोषण तक: जानिए कैसे UP में मजबूत हुई मातृ सुरक्षा व्यवस्था

आज उत्तर प्रदेश सुरक्षित है, क्योंकि यहां की माताएं सुरक्षित हैं. इस धरती पर, जहां पृथ्वी को भी ‘माता’ कहकर पूजा जाता है, वहां हर मां का स्वास्थ्य और सम्मान शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है.

एम्बुलेंस से पोषण तक: जानिए कैसे UP में मजबूत हुई मातृ सुरक्षा व्यवस्था

मां… यह केवल दो अक्षरों का शब्द नहीं, यह संपूर्ण सृष्टि का सार है. वह आदिशक्ति है, जो जीवन को जन्म देती है; जो पीड़ा को अपने भीतर समेटकर भी चेहरे पर मुस्कान सजा लेती है; जो अंधेरे से भरी रात में भी अपनी आंखों की रोशनी से दूसरों का जीवन आलोकित करती है. हमारे अस्तित्व की पहली धुन, पहली लय, पहली अनुभूति- सब मां से ही आरंभ होती है. उसके आंचल में केवल स्नेह नहीं होता, बल्कि करुणा, त्याग और सुरक्षा का वह असीम विस्तार होता है, जो एक पूरी दुनिया को समेट लेता है.

इसीलिए किसी भी समाज की संवेदनशीलता का वास्तविक मापदंड यह होता है कि वहां मातृत्व कितना सुरक्षित, सम्मानित और संरक्षित है. उत्तर प्रदेश ने बीते कुछ वर्षों में इस सत्य को न केवल समझा, बल्कि इसे शासन की प्राथमिकताओं में भी स्थान दिया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सोच में ‘मातृशक्ति वंदन' केवल एक विचार नहीं, बल्कि नीतियों और योजनाओं के रूप में प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित होता है.

कल विश्व मातृ दिवस था. यह केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि उस अमूल्य ऋण का स्मरण करने का अवसर है, जिसे कोई संतान कभी नहीं चुका सकती. यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि मातृ सुरक्षा केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मा से जुड़ा हुआ प्रश्न है. जब कोई गर्भवती महिला विश्वास के साथ अस्पताल तक पहुंचती है, जब नवजात की पहली किलकारी मां की मुस्कान से मिलती है- तो यह केवल एक परिवार की खुशी नहीं होती, बल्कि पूरे समाज का विश्वास सुदृढ़ होता है.

एक समय था जब उत्तर प्रदेश मातृ मृत्यु दर, कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे गंभीर संकटों से जूझ रहा था. आज वही प्रदेश मातृ सुरक्षा के क्षेत्र में एक सकारात्मक परिवर्तन की मिसाल बनकर उभर रहा है. यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि सुशासन की संवेदनशील आत्मा से जुड़ा हुआ है.

दशकों तक उत्तर प्रदेश की पहचान मातृ मृत्यु दर की चिंताजनक स्थिति से बनी रही. प्रसव की पीड़ा में जूझती अनेक माताएं, जो अस्पताल तक पहुंचने से पहले ही हार मान लेती थीं- वह एक कठोर यथार्थ था. लेकिन 2017 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में स्थिति बदलने का एक दृढ़ संकल्प लिया गया कि अब इस प्रदेश की कोई मां केवल अभावों के कारण अपनी जान नहीं गंवाएगी.

यह संकल्प केवल घोषणा नहीं था, बल्कि एक नैतिक प्रतिबद्धता थी, जो धरातल पर उतरकर परिणामों में दिखी और लाखों माताओं की सुरक्षित सांसों में जी उठी.

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इसी का परिणाम है कि जहां 2017 में संस्थागत प्रसव की दर लगभग 67 प्रतिशत थी, वहीं आज यह 97 प्रतिशत के करीब पहुंच गई है—जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है.

इस परिवर्तन के पीछे व्यापक और समन्वित प्रयासों की श्रृंखला रही है. 102 और 108 एंबुलेंस सेवाओं का विस्तार इसका प्रमुख आधार बना. आज प्रदेश में 102 सेवा के तहत 2,270 और 108 सेवा के अंतर्गत लगभग 2,200 एंबुलेंस 24 घंटे सक्रिय हैं. वे गांव, जहां कभी प्रसव पीड़ा से कराहती महिला को खाट पर लादकर मीलों दूर ले जाना पड़ता था, आज वहां एंबुलेंस की आवाज ही उम्मीद का संदेश बन चुकी है.

जननी सुरक्षा योजना ने संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाती है. प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के साथ मिलकर यह सहायता और अधिक प्रभावी हो जाती है. इसी प्रकार प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान ने गर्भवती महिलाओं के लिए नियमित और निःशुल्क जांच की एक सशक्त व्यवस्था प्रदान की.

मिशन इंद्रधनुष ने टीकाकरण को जन-आंदोलन में बदला, तो पोषण अभियान ने मातृत्व की बुनियाद को मजबूत किया. मुख्यमंत्री मातृत्व अमृत योजना के माध्यम से पोषण किट और आर्थिक सहयोग देकर गर्भवती और धात्री माताओं के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया गया. आंगनबाड़ी सेवाओं के माध्यम से पूरक आहार पहुंचाकर इस प्रयास को जमीन तक उतारा गया.

यदि विश्व मातृ दिवस पर हम पीछे मुड़कर देखें, तो एक संतोष और गर्व का भाव स्वाभाविक रूप से उभरता है. वही उत्तर प्रदेश, जो कभी मातृ मृत्यु के मामलों में पीछे था, आज योजनाबद्ध प्रयासों और संवेदनशील नीतियों के बल पर एक नई पहचान गढ़ रहा है. यह परिवर्तन किसी एक व्यक्ति या एक योजना का परिणाम नहीं है, बल्कि उन असंख्य स्वास्थ्यकर्मियों, आशा बहनों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और नीति-निर्माताओं की सामूहिक साधना का परिणाम है.

‘मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना' ने जहां बेटियों के भविष्य को सुरक्षित करने का मार्ग प्रशस्त किया है, वहीं इसने माताओं के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आत्मविश्वास को भी मजबूत किया है. ‘मिशन शक्ति' के माध्यम से मातृ सुरक्षा को सामाजिक सुरक्षा से जोड़ना भी एक दूरदर्शी पहल है.

हालांकि, यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि यात्रा अभी बाकी है. शिशु मृत्यु दर और नवजात मृत्यु दर को राष्ट्रीय लक्ष्यों तक लाना, तथा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं की खाई को पाटना अभी भी चुनौती बनी हुई है. लेकिन परिवर्तन की दिशा में चल रहे इस प्रदेश ने यह साबित कर दिया है कि सही नीयत और निरंतर प्रयास के साथ बदलाव संभव है.

विशाल जनसंख्या और विस्तृत भौगोलिक परिदृश्य वाले इस राज्य में हर जीवन की रक्षा एक सतत यज्ञ के समान है. फिर भी, 2017 से अब तक का सफर इस विश्वास को मजबूत करता है कि उत्तर प्रदेश सही दिशा में आगे बढ़ रहा है.

हमारी सनातन संस्कृति में ‘जननी' और ‘जन्मभूमि' को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ माना गया है. यहां ‘माता' केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा और भविष्य की संरक्षिका होती है. उत्तर प्रदेश का वर्तमान नैरेटिव इस सत्य को पुष्ट करता है कि जब नेतृत्व में दृढ़ इच्छाशक्ति हो और हृदय में जनता के प्रति संवेदना, तब संसाधनों की सीमाएं भी बाधा नहीं बनतीं.

आज उत्तर प्रदेश सुरक्षित है, क्योंकि यहां की माताएं सुरक्षित हैं. इस धरती पर, जहां पृथ्वी को भी ‘माता' कहकर पूजा जाता है, वहां हर मां का स्वास्थ्य और सम्मान शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है.

विश्व मातृ दिवस पर उत्तर प्रदेश का संदेश स्पष्ट है-  
“मां की सुरक्षा केवल एक स्वास्थ्य नीति नहीं, बल्कि एक सशक्त और संवेदनशील सभ्यता का आधार है.”

डॉ आशा राठी द्वारा

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): डॉ आशा राठी एक वरिष्ठ महिला रोग विशेषज्ञ हैं. इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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