Real Cancer Survival Story: ज़िंदगी कभी-कभी किसी मंझे हुए खिलाड़ी की तरह हमारे सामने ऐसी चुनौतियां फेंकती है कि इंसान बिखरने लगता है. ऑस्ट्रेलिया की एनेट जोन्स की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. यह कहानी हम आपके लिए लाए हैं cancer.org से, जहां बहुत से कैंसर मरीजों ने अपनी आपबीती साझा की है. यह कहानी सिर्फ एक बीमारी की नहीं है, यह कहानी है उस 'उम्मीद' की जो मरते-मरते भी ज़िंदा रह गई...
एक फोन कॉल और थम गई दुनिया
जुलाई 2019 की उस दोपहर एनेट को नहीं पता था कि उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली है. 58 साल की उम्र में उन्हें पता चला कि उन्हें 'एम्पुलरी कैंसर' (Ampullary Cancer) है. यह एक दुर्लभ कैंसर है जो पित्त नली (Bile duct) को अपना निशाना बनाता है.
एनेट कहती हैं, "उस वक्त ऐसा लगा मानो पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई हो. अभी तो मैंने अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत की थी, और अचानक मौत का साया सामने खड़ा था."
11 घंटों का वो 'महायुद्ध'
कैंसर का पता चलने के ठीक एक महीने बाद एनेट को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया. वह कोई मामूली सर्जरी नहीं थी, बल्कि 11 घंटे लंबी 'व्हिपल सर्जरी' (Whipple Surgery) थी. डॉक्टरों ने उनके पेट और पैंक्रियास के कुछ हिस्सों को काटकर अलग कर दिया.
सर्जरी के बाद का दर्द असहनीय था, लेकिन एनेट के मन में जीने की ज़िद थी. कीमोथेरेपी शुरू हुई, शरीर कमज़ोर होने लगा, बाल झड़ने लगे, लेकिन एनेट ने हार नहीं मानी. लेकिन तभी... दुनिया थम गई. कोविड-19 ने दस्तक दी.
"काश" और "डर" के बीच की जंग
आधा इलाज हो चुका था और बाहर मौत का तांडव (कोरोना) शुरू हो गया था. एनेट के सामने एक बड़ा सवाल था- क्या इलाज रोक दूं? बाहर संक्रमण का खतरा है और मेरा शरीर पहले ही कमज़ोर है.
लेकिन एनेट ने खिड़की से बाहर देखते हुए खुद से एक वादा किया. उन्होंने सोचा, "अगर आज डरकर इलाज बीच में छोड़ दिया और कल कैंसर वापस आ गया, तो मैं अपनी पूरी ज़िंदगी उस एक 'काश' के साथ कैसे गुज़ारूंगी?" मौत के दो रास्तों में से उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना और बाकी की 4 कीमोथेरेपी साइकिल्स पूरी करने का फैसला किया.
सन्नाटे, आंसू और चार दीवारें
एनेट के लिए लॉकडाउन सिर्फ पाबंदी नहीं, एक गहरा अकेलापन था. उनका परिवार दूसरे राज्यों में था, सरहदें बंद थीं और मिलना नामुमकिन. वह अपने पार्टनर एडी और उनके दो बच्चों के साथ रहती थीं. दुखद बात यह थी कि उन्हें साथ रहते हुए अभी सिर्फ 8 महीने ही हुए थे.
एक तरफ कैंसर की मार, दूसरी तरफ कीमो का दर्द और ऊपर से घर के भीतर का तनाव. रिश्तों पर दबाव बढ़ने लगा था. एनेट अक्सर रातों को उठकर सोचतीं कि क्या वह एडी के लिए बोझ तो नहीं बन रहीं?
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अजनबियों का वो छोटा सा सहारा
जब अपने दूर थे, तब कुछ अनजान चेहरों ने एनेट को टूटने से बचाया.
- कभी सुपरमार्केट में किसी अजनबी ने लाइन में अपनी जगह एनेट को दे दी...
- कभी किसी ने ऊंची शेल्फ से सामान उतारकर उनके थैले में रख दिया...
- तो कभी किसी ने चुपचाप उनके भारी बैग उठाकर गाड़ी तक पहुंचा दिए.
एनेट भीगी आंखों से कहती हैं, "जब कैंसर होता है, तो आपकी ज़िंदगी पर से आपका कंट्रोल छिन जाता है. ऐसे में किसी अजनबी का छोटा सा मुस्कुराना भी आपके लिए संजीवनी बन जाता है."
उन 'मददगार हाथों' का दर्द कौन समझेगा?
एनेट इस ब्लॉग के ज़रिए एक बहुत गहरी बात कहती हैं. हम हमेशा मरीज़ का हाल पूछते हैं, लेकिन जो दिन-रात मरीज़ की सेवा कर रहा है (Caregiver), उसका हाल कोई नहीं पूछता.
एनेट को मलाल है कि काश किसी ने एडी (उनके पार्टनर) का कंधा थपथपाकर पूछा होता, "दोस्त, तुम कैसे हो? चलो आज थोड़ा टहल कर आते हैं." देखभाल करने वाले भी इंसान होते हैं, उन्हें भी सहारे की ज़रूरत होती है.
ऑस्ट्रेलिया की एनेट जोन्स की इस कहानी से हम क्या सीखें?
एनेट जोन्स आज हमारे बीच एक मिसाल हैं. उन्होंने न सिर्फ कैंसर को हराया, बल्कि कोविड के अकेलेपन को भी मात दी. वह कहती हैं कि कोविड ने हमें दूसरों की मदद करना सिखाया है, और हमें इस सीख को कभी भूलना नहीं चाहिए.
ज़िंदगी छोटी है, पर आपकी हिम्मत उससे कहीं ज़्यादा बड़ी है...
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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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