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प्लास्टिक छीन रहा जिंदगी के साल, 2040 तक 45 लाख हेल्दी ईयर्स हो सकते हैं खत्म, स्टडी का अनुमान

Plastic Pollution: लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन की मुख्य लेखिका मेगन डीनी के मुताबिक, यह आकलन कुल सेहत पर पड़ने वाले असर का बहुत कम अनुमान है. यह स्टडी द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित हुई है.

प्लास्टिक छीन रहा जिंदगी के साल, 2040 तक 45 लाख हेल्दी ईयर्स हो सकते हैं खत्म, स्टडी का अनुमान
Plastic Pollution Impact:

Plastic Health Risks: आज प्लास्टिक हमारी रोजाना की जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन चुका है, जिसके बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल लगता है. पानी की बोतल, खाने की पैकेजिंग, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक सामान, हर जगह प्लास्टिक मौजूद है. लेकिन, जिस सुविधा के लिए हम प्लास्टिक पर निर्भर होते जा रहे हैं, वही धीरे-धीरे इंसानी सेहत के लिए एक वैश्विक संकट बनता जा रहा है. शोधकर्ताओं ने मंगलवार को चेतावनी दी है कि अगर दुनिया ने अभी ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले सालों में प्लास्टिक के प्रोडक्शन, इस्तेमाल और निपटान से सेहत को होने वाला नुकसान कई गुना बढ़ सकता है.

ब्रिटिश-फ्रेंच शोधकर्ताओं की एक टीम ने प्लास्टिक के पूरे लाइफसाइकिल को समझने की कोशिश की, यानी तेल और गैस निकालने से लेकर प्लास्टिक प्रोडक्ट बनने, उनके इस्तेमाल और आखिरकार कचरे में पहुंचने तक. इस स्टडी में यह साफ हुआ कि प्लास्टिक सिर्फ पर्यावरण की नहीं, बल्कि सीधे तौर पर इंसानी सेहत की समस्या भी है. हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि उनकी मॉडलिंग स्टडी में माइक्रोप्लास्टिक और खाने की पैकेजिंग से निकलने वाले कई केमिकल जैसे अहम खतरे अभी पूरी तरह शामिल ही नहीं किए गए हैं.

लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन की मुख्य लेखिका मेगन डीनी के मुताबिक, यह आकलन कुल सेहत पर पड़ने वाले असर का बहुत कम अनुमान है. यह स्टडी द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित हुई है और दुनिया भर में प्लास्टिक के कारण खोई गई हेल्दी लाइफ के सालों का अनुमान लगाने वाली पहली रिसर्च मानी जा रही है.

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DALYs क्या बताते हैं?

शोधकर्ताओं ने DALYs (डिसएबिलिटी-एडजस्टेड लाइफ ईयर्स) नाम के पैमाने का इस्तेमाल किया. यह बताता है कि बीमारी या समय से पहले मौत की वजह से कितने स्वस्थ साल खो गए. स्टडी के अनुसार, अगर सब कुछ यूं ही चलता रहा तो प्लास्टिक के कारण होने वाले DALYs की संख्या 2016 में 21 लाख से बढ़कर 2040 तक 45 लाख से भी ज्यादा हो सकती है.

सबसे बड़ा खतरा कहां से आता है?

रिसर्च में सामने आया कि प्लास्टिक प्रोडक्शन के दौरान निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों का सेहत पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है. इसके बाद वायु प्रदूषण और जहरीले केमिकल का नंबर आता है. उदाहरण के तौर पर, एक साधारण प्लास्टिक पानी की बोतल को ही लें. इसका सफर तेल और गैस निकालने से शुरू होता है, फिर केमिकल प्रोसेस के जरिए PET बोतल बनती है, जिसे दुनिया भर में ट्रांसपोर्ट किया जाता है. इस्तेमाल के बाद यह अक्सर लैंडफिल में चली जाती है, जहां इसे सड़ने में सैकड़ों साल लग जाते हैं और इस दौरान जहरीले केमिकल निकलते रहते हैं.

रीसाइक्लिंग काफी नहीं:

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि सिर्फ रीसाइक्लिंग से बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ेगा. सबसे असरदार उपाय यह है कि शुरुआत में ही गैर-जरूरी प्लास्टिक का प्रोडक्शन कम किया जाए.

हाल ही में प्लास्टिक प्रदूषण पर दुनिया की पहली संधि की बातचीत भी तेल प्रोडक्शन देशों के विरोध के कारण अटक गई. इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि देश चाहें तो राष्ट्रीय स्तर पर सख्त नियम बनाकर इस वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से निपट सकते हैं.

साफ है प्लास्टिक की समस्या सिर्फ भविष्य की नहीं, बल्कि आज की भी है. अगर अब कदम नहीं उठाए गए, तो इसकी कीमत हमें अपनी सेहत से चुकानी पड़ेगी.

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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