मोटा होना क्या सच में आपके अंदर के कॉन्फिडेंस को खत्म कर सकता है? आज के समय में शायद नहीं लेकिन जब आपकी उम्र 13-14 साल हो और आपको हर कोई मोटा कहे वो भी इसलिए नहीं क्योंकि आप बहुत मोटे नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि आपकी ही उम्र की आपकी सहेली फिट और स्लिम है और आप थोड़ा सा चबी. खुद को बॉडी को एक्सेप्ट करना आज हम सभी को अच्छे से आता है लेकिन बचपन के उस मन में ये बातें हमेशा के लिए घर कर जाती हैं. ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ भी. बचपन से मुझे चबी होने की वजह से ये तो मोटी है कह दिया जाता था. इसलिए मुझे मोटा दिखना बिल्कुल पसंद नहीं था. शायद ये सोच मैंने खुद नहीं बनाई थी, बल्कि धीरे-धीरे आसपास के लोगों ने इस सोच को मेरे अंदर बोया था. मेरी बेस्ट फ्रेंड के पतले होने के चलते मेरी गिनती मोटे लोगों में होती थी.
अब लोग मुझे मोटा नहीं कहेंगे
हम सब पुलिस कॉलोनी में रहते थे. वहां पर कुल 12 क्वार्टर में अलग-अलग फैमिली रहती थीं. जब कोई कमरा खाली होता था तो वहां नई फैमिली आती थी. इसी तरह एक दिन हमारी कॉलोनी में भी एक नई लड़की आई. वो मुझसे भी ज्यादा मोटी थी. उस दिन पहली बार खुशी महसूस हुई की वाह अब कोई मुझे मोटा नहीं कहेगा.अब लोग उसे मोटा कहेंगे. उस समय की ये राहत मुझे आज भी याद है. लेकिन उसके पीछे छुपी सोच मुझे अब जाकर समझ आती है.
नोएडा आकर सब कुछ बदल गया
बचपन में बस अपने से ज्यादा मोटी लड़की को देखकर खुश हो गई थी. तब खुद को पतला करना या फिट करना है ये सब बातें दिमाग में नहीं आती थी. तब ना तो डाइटिंग के बारे में पता ता, ना खुद को रोकने की आदत. जो मन किया, खाया. लेकिन वक्त के साथ सब बदलता गया. खाने का शौक मुझे हमेशा से ही था. हालांकि घर पर मम्मी मेरे लिए अलग-अलग तरह की चीजें बनाती थीं और इतने पैसे नहीं होते थे कि बाहर जाकर खाया जाए. इसलिए घर पर मम्मी जो भी बनाकर देती थी मजे से खा लेती थी. लेकिन जब मैं नोएडा आई, घर से दूर, मम्मी की नजरों से दूर फिर तो जैसे मुझे पूरी आजादी मिल गई.

बाहर का खाना आदत बन गया
अब ना तो कोई रोक-टोक और ना ही क्या, कितना, कब और कैसे खा रहे हैं इसकी चिंता. कॉलेज लाइफ ने मेरे इस शौक को और हवा दी. जिसके चलते हर दिन चिप्स का एक पैकेट खाए बिना मेरा दिन खत्म ही नहीं होता था. पीजी का फीका, बेस्वाद खाना मुझे कभी पसंद नहीं आया. फिर घर में मसालेदार और टेस्टी खाना खाने की आदत ने इस पीजी के खाने को सिरे से नकार दिया था. हालांकि कुछ लड़कियां उस खाने को उतने ही चाव से खाती थीं. इसी वजह से मेरे खाने में सुबह छोले-कुल्चे, दोपहर में छोले-भटूरे, और रात में रोल या चिली पोटैटो होता था. कभी पीजी में कुछ स्पेशल बनता था तो मैं खा लेती थी. या फिर भैया से सामान लेकर अपने लिए अलग से बना लेती थी. पीजी में भी लोग मेरे बनाए खाने के दीवाने थे, वो भी मेरे चटोरेपन में शामिल हुई और मजेदार खाना हम सब मिलकर खाने लगे.
अब मैं सच में मोटी हो गई थी
लेकिन इस स्वाद की कीमत मैंने अपने शरीर से चुकाई. धीरे-धीरे मेरा वजन बढ़कर 66 किलो तक पहुंच गया. कॉलेज खत्म हुआ ऑफिस ज्वाइन करने के बाद भी कुछ नहीं बदला. ना खाने की आदतें, ना सोच. वजन बढ़ रहा था, लेकिन उसकी परवाह करने की ना तो फुर्सत थी और ना ही इच्छा.
ये भी पढ़ें: मैंने 120 दिन तक फ्राइड फूड नहीं खाया, नतीजे देखकर खुद हैरान रह गया, 23 साल के अवधेश ने साझा किया अनुभव
एक तस्वीर ने बदली सोच
सर्दियों का मौसम था. ऑफिस में टीम के साथ एक ग्रुप फोटो क्लिक हुई. मैंने उस दिन सफेद रंग की हुडी पहनी थी. जब वो फोटो ऑफिस ग्रुप में शेयर हुई और मैंने खुद को उसमें देखा. मै सच में बहुत ही मोटी और बेकार दिख रही थी. मुझे खुद को देखकर शर्म आई और उस फोटो को मैने डिलीट कर दिया. ये फोटो ही मेरा टर्निंग प्वाइंट थी.
मैं जानती थी कि मैं खाने की शौकीन हूं. खाना छोड़ना मेरे बस की बात नहीं थी. जिम जाना या सिर्फ सलाद खाकर जीने के बारे में तो मै सपने में भी नहीं सोच सकती थी. इसलिए मैंने एक अलग रास्ता चुना.
डाइटिंग कभी नहीं की बस तरीका बदला

मैंने खाना नहीं छोड़ा, बस उसको खाने का तरीका बदल दिया. मैंने अपने पोर्शन पर ध्यान देना शुरू किया. जब भी कुछ खाने का मन करता, तो चिप्स की जगह फ्राइड मुरमुरे खाने लगी. भूख लगने पर पॉपकॉर्न और ओट्स को टेस्टी तरीके से बनाकर खाना शुरू किया. इसके साथ ही अपने फेवरेट साउथ इंडियन फूड उपमा और इडली को अपनी डाइट में ज्यादा शामिल किया.
मैंने कभी भी अपने मील्स को बंद नहीं किया, बल्कि मै खाने को कई बार में छोटे-छोटे हिस्सों में खाती थी. दिन में एक बार बहुत ज्यादा खाने की जगह मैं कई बार थोड़ा-थोड़ा खाना शुरू किया. ग्रीन टी का उस वक्त क्रेज बहुत था तो उसको भी अपनी आदत बना लिया. लेकिन इस दौरान ऐसा नहीं है कि मैने अपने फेवरेट फूड को नहीं खाया हां बस उसकी मात्रा और हफ्ते में 1 बार खाने की कोशिश की.
लगभग 1 साल लगे
मेरी इस कड़ी तपस्या का फल मुझे धीरे-धीरे मिला और मैने लगभग 10 किलो वजन कम कर लिया. जिम जाना आज भी मेरे रूटीन का हिस्सा नहीं बन पाया. लेकिन मैंने अपनी लाइफस्टाइल में छोटे-छोटे चेंजेज किए थे. तब सैलरी ज्यादा नहीं थी तो मैं ऑफिस से पीजी जाने के लिए अपने दोस्तों के साथ आधे रास्ते तक पैदल जाती थी. अपने खाने की आदतें बदलकर और बाहर का खाना ज्यादा से ज्यादा एवॉइड करना मेरे लिए फायदेमंद साबित हुआ.
आज भी फॉलो करती हूं ये रूल
इस बात को लगभग 4-5 साल हो गए हैं और आज भी मैं कोई डाइट फॉलो नहीं करती. बस अपनी उसी बनाई हुई रणनीति पर टिकी रहती हूं. मैं आज भी बाहर का मजे से खाती हूं, क्योंकि मै फूडी हूं...लेकिन जब भी मुझे लगता है कि मेरा वजन बढ़ रहा है तो मै अपने पुराने वाले प्लान पर वापस चली जाती हूं. अगर दिन में बाहर का और हैवी या ऑयली खाना खा लिया है तो रात को खाना नहीं खाती या फिर दूध या कुछ लाइट और हेल्दी खा लेती हूं. चिप्स की जगह हेल्दी स्नैक्स ले लेते हैं.
रात को देर तक जागने की आदत आज भी है, जिसमें जंक फूड जमकर खाया जाता है तो आज भी रात में भूख लगने पर मैं भेलपूरी बनाकर खा लेती हूं, ये टेस्टी और हेल्दी होने के साथ ही पेट को भर देता है. भेलपूरी खाकर पानी पिओ और पेट फुल. अब मेरा वजन 55 किलो के आसपास रहता है. जैसे ही ये 55-56 से ऊपर जाता है तो मै अपनी इस प्लान के साथ अपने वजन को मेनटेन रखने की कोशिश करती हूं. अब मैं खुद को दूसरों से कंपेयर नहीं करती हूं. ना ही मैं दूसरों के लिए ऐसा करती हूं. ये मेरी च्वाइस है और अपनी मर्जी से मैं ये करती हूं.
History of Samosa- Swaad Ka Safar | समोसे का इतिहास | जानें ईरान से भारत कैसे पहुंचा समोसा
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं