Pregnancy Health Tips: भारत में इस साल गर्मी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. दिल्ली में अप्रैल में ही पारा 40 के पार चला गया, मई में तो उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में तापमान 45 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है. हम और आप इसे सिर्फ 'एक और खराब मौसम' मानकर झेल रहे हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह भीषण गर्मी गर्भवती महिलाओं और उनके होने वाले बच्चों के लिए एक अदृश्य दुश्मन (Invisible Crisis) बनती जा रही है?
क्या कहती है 2026 की ताज़ा रिपोर्ट?
हाल ही में 'इंडो-जेनेटिक' मैदानी इलाकों (उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल) पर आधारित एक नई स्टडी सामने आई है. इस स्टडी के आंकड़े डराने वाले हैं. रिसर्च में पाया गया कि जो महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान बहुत ज्यादा गर्मी या बहुत ज्यादा ठंड का सामना करती हैं, उनमें वक्त से पहले डिलीवरी (Preterm Birth) का खतरा 2.26 गुना बढ़ जाता है.
आसान भाषा में समझें तो, प्रेग्नेंसी के लिए 25 से 27 डिग्री का तापमान सबसे सही माना जाता है. लेकिन जैसे ही यह औसत तापमान 27 से 30 डिग्री पहुंचता है, खतरा बढ़ना शुरू हो जाता है. अगर तापमान 32 डिग्री से ऊपर लगातार बना रहे, तो प्री-मैच्योर डिलीवरी का रिस्क 10% तक बढ़ जाता है.

शरीर पर कैसे असर डालती है गर्मी?
मधुकर रेनबो चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल की सीनियर गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. अलका चौधरी बताती हैं कि गर्मी सिर्फ पसीना और बेचैनी नहीं लाती, बल्कि यह शरीर के अंदरूनी सिस्टम को बिगाड़ देती है. जब शरीर का तापमान बढ़ता है, तो डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) होने लगती है. इससे गर्भाशय (Uterus) तक होने वाला ब्लड फ्लो कम हो जाता है और तनाव वाले हार्मोन बढ़ जाते हैं. यही वजह है कि बच्चा समय से पहले पैदा हो सकता है या उसका वजन कम रह सकता है.
वहीं, दिल्ली के सीके बिरला हॉस्पिटल की डॉ. कीर्ति खेतान का कहना है कि प्रेग्नेंसी के शुरुआती महीनों में ज्यादा गर्मी झेलने से हाई ब्लड प्रेशर, जेस्टेशनल डायबिटीज और यहां तक कि गर्भपात (Miscarriage) का खतरा भी बढ़ जाता है. अस्पतालों में देखा जा रहा है कि गर्मियों के पीक महीनों में गर्भपात के मामले बढ़ जाते हैं.
सिर्फ सेहत नहीं, इलाज में भी आ रही है रुकावट-
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के आंकड़ों ने एक और चौंकाने वाली बात बताई है. भीषण गर्मी की वजह से महिलाएं अपने रुटीन चेकअप (Antenatal Care) के लिए अस्पताल जाने से कतरा रही हैं. दोपहर की चिलचिलाती धूप और सफर की मुश्किलों के कारण कई महिलाएं डॉक्टर के पास नहीं जा पातीं. इसका नतीजा यह होता है कि अगर प्रेग्नेंसी में कोई छोटी दिक्कत आ भी रही है, तो उसका पता सही समय पर नहीं चल पाता.
नयी माताओं के लिए भी बड़ी चुनौती-
डिलीवरी के बाद भी खतरा टलता नहीं है. नई मांओं के लिए गर्मी में रिकवर करना मुश्किल हो जाता है. बहुत ज्यादा गर्मी की वजह से थकान, इन्फेक्शन का डर और डिहाइड्रेशन के कारण ब्रेस्टफीडिंग (दूध पिलाने) में भी दिक्कतें आती हैं.
पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की पूनम मुत्तरेजा कहती हैं कि यह अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि एक 'पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी' जैसा है. गरीब तबके की महिलाएं, जिनके पास कूलिंग के साधन (AC या कूलर) नहीं हैं, वे सबसे ज्यादा जोखिम में हैं.
डॉक्टर क्या दे रहे हैं सलाह?
हैदराबाद के मेडिकवर अस्पताल की डॉ. पृथ्वी पेरुम के मुताबिक, गर्मी के तनाव का सीधा असर भ्रूण के विकास पर पड़ता है. उन्होंने आने वाले दिनों के लिए गर्भवती महिलाओं को कुछ खास टिप्स दिए हैं-
- पानी का खूब सेवन- दिन में कम से कम 3 से 4 लीटर पानी पिएं.
- ठंडी चीजें खाएं- तरबूज, अनार, छाछ और रागी जैसी चीजों को अपनी डाइट में शामिल करें.
- धूप से बचें- दोपहर के समय बाहर निकलने से बचें. अगर बहुत जरूरी हो, तो डॉक्टर से फोन या वीडियो कॉल पर बात करें.
- आरामदायक कपड़े- हल्के रंग के और सूती कपड़े पहनें ताकि शरीर को हवा लगती रहे.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब समय आ गया है कि सरकार और प्रशासन को इसके लिए खास इंतजाम करने होंगे. अस्पतालों के ओपीडी टाइमिंग में बदलाव, हर इलाके में कूलिंग सेंटर्स की सुविधा और गर्मी से बचने के लिए जागरूकता अभियान चलाना बहुत जरूरी हो गया है. अगर हमने आज इस पर ध्यान नहीं दिया, तो क्लाइमेट चेंज की ये मार हमारी आने वाली पीढ़ी को कमजोर कर देगी.
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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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