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AI से काम आसान, लेकिन दिमाग बेकार? वैज्ञानिकों ने दी 'कॉग्निटिव सरेंडर' की चेतावनी

क्या ChatGPT और Gemini जैसे AI टूल्स पर बढ़ती निर्भरता आपके दिमाग को कमजोर बना रही है? 1,222 लोगों पर हुई रिसर्च में 'कॉग्निटिव ऑफलोडिंग' का बड़ा खतरा सामने आया है। जानिए एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं.

AI से काम आसान, लेकिन दिमाग बेकार? वैज्ञानिकों ने दी 'कॉग्निटिव सरेंडर' की चेतावनी
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ChatGPT से ईमेल लिखवाना, Gemini से ट्रिप प्लान कराना या AI से हर सवाल का जवाब पूछना अब आम बात हो गई है. लेकिन अगर आप हर छोटे-बड़े काम के लिए AI पर निर्भर होते जा रहे हैं, तो यह आदत आपके दिमाग को धीरे-धीरे कमजोर भी बना सकती है. 1,222 लोगों पर हुई एक स्टडी में वैज्ञानिकों ने 'कॉग्निटिव ऑफलोडिंग' नाम की ऐसी समस्या की ओर इशारा किया है, जो आपकी सोचने, सीखने और समस्याएं हल करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है.

क्‍या आप भी आजकल अपने हर छोटे- मोटे काम के लिए सीधा किसी एआई टूल की शरण में पहुंच जाते हैं. आजकल मेल ल‍िखने से लेकर कंप्‍यूटर कोड‍िंग, ट्रांसलेटशन, कोई ट्र‍िप प्‍लान करने से लेकर अपने क‍िसी करीबी के ल‍िए तोहफा चुनने तक जैसे काम लोग एआई की मदद से कर रहे हैं. 

आपको देना है एक आसान सा प्रोम्‍ट, जिसमें भले ही आपने क‍ितनी ही गलति‍यां की हों, और आपका काम बन जाता है. लेक‍िन यह ज‍ितना मजेदार और टाइम सेव‍िंग लग रहा है असल में यह उतना ही. क्‍योंक‍ि आपकी यह आदत आपके द‍िमाग पर ऐसा असर डाल रही है कि वह कमजोर होता जा रहा है. इसे आजकल वैज्ञानिक "कॉग्निटिव ऑफलोडिंग" या "कॉग्निटिव सरेंडर" (दिमाग का आत्मसमर्पण) कह रहे हैं.

1,222 लोगों पर हुई रिसर्च में खुला बड़ा राज

एक अमेरिकी-ब्रिटिश स्टडी में 1,222 लोगों पर एक टेस्ट किया गया. इसमें सामने आया कि जिन लोगों ने मैथ के सवाल या रीडिंग कॉम्प्रिहेंशन हल करने के लिए AI टूल्स का सहारा लिया, शॉर्ट-टर्म में तो उनकी परफॉर्मेंस सुधर गई. लेकिन लॉन्ग-टर्म में उनके नतीजे बहुत खराब रहे. सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जब ये AI टूल्स उपलब्ध नहीं थे, तो लोगों में खुद से कोशिश करने की इच्छा ही खत्म हो चुकी थी!

स्टडी में कहा गया - "ये र‍िजल्‍ट बहुत चिंताजनक हैं. किसी भी नई स्किल को सीखने के लिए लगातार कोशिश करना (परसिस्टेंस) सबसे जरूरी है. अगर हम कोशिश ही नहीं करेंगे, तो लंबे समय में कुछ सीख ही नहीं पाएंगे."

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कैलकुलेटर और AI में क्या फर्क है?

कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी की ग्रेस लियू ने बताया कि हर सवाल का तुरंत बना-बनाया जवाब देने की AI की यह आदत यूजर्स से "सीखने के मौके" छीन रही है.

लोग अक्सर कहते हैं कि पहले कैलकुलेटर भी तो आया था! लेकिन AI और कैलकुलेटर में जमीन-आसमान का अंतर है. इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर ने इंसानों को सिर्फ समीकरण हल करने में मदद की- लेकिन मैथ का फॉर्मूला, उसका तरीका और सोचने की पूरी प्रक्रिया इंसानों के दिमाग में ही रही. इसके उलट, AI तो इंसानों की सोचने और रीजनिंग करने की पूरी एक्टिविटी को ही खुद टेकओवर कर लेता है.

दिमाग का सिंपल रूल: 'यूज करो या खो दो'

फ्रांस के CNRS के रिसर्चर जोहान चेवलरे ने इसके पीछे इंसानी फितरत का एक बड़ा सच बताया है. उन्होंने कहा, "इंसानों में एनर्जी बचाने की बहुत मजबूत आदत होती है."

हम हमेशा ऐसे शॉर्टकट ढूंढते हैं जो हमें सीधे नतीजे तक पहुंचा दें, बिना इस बात की परवाह किए कि उस जानकारी को गहराई से समझा जाए. हमारा दिमाग भी बहुत शातिर है- यह 'एनर्जी सेविंग मोड' पर काम करता है. अगर आप दिमाग के कुछ कनेक्शंस (जैसे खुद से सोचना, लिखना या याद रखना) का इस्तेमाल करना बंद कर देंगे, तो दिमाग उन्हें बनाए रखने की जहमत नहीं उठाएगा और धीरे-धीरे आपकी वो क्षमता कम होने लगेगी.

साल 2025 की एक एमआईटी स्टडी सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई थी. इस स्‍टडी में देखा गया था कि जो स्टूडेंट्स निबंध यानि एस्‍से  लिखने के लिए जेनरेटिव AI का इस्तेमाल कर रहे थे, उनमें खुद से सोचने और विश्लेषण करने की क्षमता बहुत कम पाई गई.

टेक कंपनियों ने भी माना खतरा, शुरू किए नए फीचर्स

इस चौतरफा आलोचना के बाद टेक कंपनियां भी अलर्ट हो गई हैं. वे अब चैटबॉट्स में सीधे जवाब देने के बजाय "सुकराती" (Socratic) फीचर्स ला रही हैं, खासकर स्टूडेंट्स के लिए.

ChatGPT का स्टडी मोड और Gemini की गाइडेड लर्निंग: अब ये चैटबॉट्स आपको सीधे तैयार आंसर देने के बजाय हिंट्स देते हैं और आपसे उल्टे सवाल पूछते हैं, ताकि आपका दिमाग एक्टिव रहे.

Microsoft Copilot की चेतावनियां: माइक्रोसॉफ्ट ने अपने कोपायलट मॉडल्स में गलतियों के जोखिम को लेकर वार्निंग्स जोड़ी हैं और यह यूजर्स को जानकारी दोबारा चेक करने की याद दिलाता है. माइक्रोसॉफ्ट ने खुद माना है कि अगर AI का इस्तेमाल उन कामों को ऑटोमेट करने के लिए किया जाए जो स्किल्स को डेवलप करने के लिए जरूरी हैं, तो "कॉग्निटिव ऑफलोडिंग" का असली खतरा पैदा हो जाता है.

बहरहाल, इंसानी दिमाग पर इस नई टेक्नोलॉजी के लॉन्ग-टर्म असर को पूरी तरह समझने के लिए और बड़ी स्टडीज की जरूरत है. लेकिन तब तक एक्सपर्ट्स का यही कहना है कि- "यह हमारे ऊपर है कि हम AI का इस्तेमाल अपनी सहूलियत के लिए एक असिस्टेंट की तरह करें, न कि अपना दिमाग उसके पास गिरवी रख दें!"

अक्‍सर पूछे जाने वाले सवाल : 

कॉग्निटिव ऑफलोडिंग क्या है?
AI या दूसरी तकनीकों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर होकर सोचने और याद रखने के काम को मशीनों पर छोड़ देना कॉग्निटिव ऑफलोडिंग कहलाता है.

क्या AI का ज्यादा इस्तेमाल दिमाग को कमजोर कर सकता है?
कुछ रिसर्च में संकेत मिले हैं कि AI पर अत्यधिक निर्भरता से खुद सोचने और समस्या हल करने की आदत कम हो सकती है.

AI और कैलकुलेटर में क्या अंतर है?
कैलकुलेटर केवल गणना में मदद करता है, जबकि AI कई बार सोचने और तर्क करने की पूरी प्रक्रिया को भी संभाल लेता है.

AI का सही इस्तेमाल कैसे करें?
AI को सहायक टूल की तरह इस्तेमाल करें, लेकिन सीखने, विश्लेषण और निर्णय लेने का काम पूरी तरह उस पर न छोड़ें.

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