Gujarat High Court: गुजरात हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के हित में एक मील का पत्थर साबित होने वाला फैसला सुनाया है. अब ऑफिस आने-जाने के दौरान होने वाले हादसे को 'ड्यूटी' का हिस्सा माना जाएगा. कोर्ट ने 'रोजगार के सैद्धांतिक विस्तार' के सिद्धांत को प्राथमिकता दी. इसके तहत घर से ऑफिस और ऑफिस से घर का सफर अब नौकरी का ही अभिन्न अंग माना जाएगा.
बीमा कंपनियों की दलीलें फेल
अक्सर बीमा कंपनियां यह कहकर मुआवजा देने से मना कर देती थीं कि हादसा ऑफिस के बाहर या वर्किंग आवर्स के बाद हुआ. जस्टिस जे.सी. दोशी के इस फैसले ने ऐसी दलीलों पर विराम लगा दिया है.
साल लंबी कानूनी लड़ाई का अंत
यह मामला साल 2002 का है. सूरत की सालासर पोलिटेक्स कंपनी के क्लर्क विजयकुमार वांकाला की घर लौटते समय एक्सीडेंट में मौत हो गई थी. परिवार को इंसाफ मिलने में 2 दशक से ज्यादा का समय लगा.
परिवार को मिलेगा पूरा हक
हाई कोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि मृतक के परिजन 'मुआवजा अधिनियम' (Workmen's Compensation Act) के तहत आर्थिक सहायता पाने के हकदार हैं. अदालत ने माना कि एक कर्मचारी अपनी रोजी-रोटी के लिए ही सड़क पर होता है, इसलिए उसके सफर को नौकरी से अलग नहीं देखा जा सकता. इस फैसले से न केवल सरकारी बल्कि प्राइवेट सेक्टर के लाखों कर्मचारियों को एक मजबूत कानूनी सुरक्षा कवच.
क्या है 'Doctrine of Notional Extension'?
'Doctrine of Notional Extension' श्रम कानून का एक नियम है, जिसके अनुसार कर्मचारी को कार्यस्थल तक आने-जाने (यात्रा) के दौरान हुई दुर्घटनाओं के लिए भी मुआवजा मिल सकता है. भले ही वो सीधे कार्यस्थल या कार्य के घंटों के दौरान न हुई हो... यह सिद्धांत कार्यस्थल को समय और स्थान में यथोचित रूप से विस्तारित मानता है.
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