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माइकल ओलिस: पिता क्रिकेटर, बड़े क्लबों ने किया रिजेक्ट, फिर संघर्ष कर बना मैदान का जादूगर

FIFA World cup 2026, Michael Olise's story: माइकल ओलिसे की कहानी इस बात का सबूत है कि रिजेक्शन का मतलब अंत नहीं होता.. बल्कि यह अक्सर एक नई शुरुआत होती है.

माइकल ओलिस: पिता क्रिकेटर, बड़े क्लबों ने किया रिजेक्ट, फिर संघर्ष कर बना मैदान का जादूगर
FIFA World cup 2026, Michael Olise's story

Michael Olise's story: हर बड़े खिलाड़ी की कहानी ट्रॉफियों से नहीं, ठोकरों से शुरू होती है. माइकल ओलिसे की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. आज दुनिया उन्हें फ्रांस की राष्ट्रीय टीम के सबसे रचनात्मक खिलाड़ियों में गिनती है. बड़े मुकाबलों में उनका एक पास, एक दौड़ या एक असिस्ट मैच का रुख बदल देता है. लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था. इसमें रिजेक्शन था, पहचान का संघर्ष था और खुद को साबित करने की लगातार जिद थी. माइकल ओलिसे का जन्म इंग्लैंड में हुआ और वहीं उनका बचपन बीता. उनका परिवार अलग-अलग संस्कृतियों का संगम था. पिता नाइजीरियाई मूल के हैं, जबकि मां फ्रेंच-अल्जीरियाई हैं. यही वजह थी कि बचपन से ही वे कई संस्कृतियों के बीच बड़े हुए. यही बहुसांस्कृतिक माहौल आगे चलकर उनके अंतरराष्ट्रीय करियर का सबसे बड़ा सवाल भी बन गया. आखिर वह किस देश की जर्सी पहनेंगे?

घर में क्रिकेट की चर्चा, फुटबॉल का सपना 

अक्सर बड़े खिलाड़ी ऐसे परिवारों से आते हैं, जहां खेल विरासत का हिस्सा होता है. ओलिसे के साथ ऐसा नहीं था. उनके पिता की दिलचस्पी क्रिकेट में थी. घर में फुटबॉल की तकनीक सिखाने वाला कोई नहीं था. न कोई पूर्व खिलाड़ी, न कोई कोच. फुटबॉल उनके लिए किसी पारिवारिक परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि खुद चुना हुआ सपना था. उन्होंने जो कुछ सीखा, अपने दम पर सीखा. मैदान उनका शिक्षक बना और मेहनत उनकी सबसे बड़ी ताकत.

जब चेल्सी ने बंद कर दिया दरवाजा

हर युवा फुटबॉलर का सपना किसी बड़ी अकादमी तक पहुंचना होता है. ओलिसे भी चेल्सी की प्रतिष्ठित अकादमी का हिस्सा बने, लेकिन यह सफर ज्यादा लंबा नहीं चला. किशोर उम्र में ही उन्हें अकादमी से रिलीज कर दिया गया. यह फैसला किसी भी युवा खिलाड़ी का आत्मविश्वास तोड़ सकता था. जिस क्लब को मंजिल समझा था, वहीं से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, लेकिन ओलिसे ने इसे अंत नहीं बनने दिया.

रिजेक्शन के बाद शुरू हुई असली परीक्षा

चेल्सी छोड़ने के बाद उन्होंने इंग्लैंड के कई क्लबों के दरवाजे खटखटाए. ट्रायल दिए. इंतजार किया. कई जगहों से जवाब नहीं मिला, तो कई जगह सीधे मना कर दिया गया. लगातार मिल रही असफलताओं के बावजूद उन्होंने खुद पर भरोसा नहीं छोड़ा. यही दौर उनके करियर की सबसे बड़ी परीक्षा था. यहीं उन्होंने सीखा कि सफलता से पहले धैर्य सबसे जरूरी होता है.

लगातार अस्वीकार किए जाने का असर कई खिलाड़ियों पर नकारात्मक पड़ता है, लेकिन ओलिसे के साथ इसका उल्टा हुआ. उन्होंने हर नाकामी को सीख में बदला. आज मैदान पर उनका शांत स्वभाव, सही समय पर सही फैसला लेने की क्षमता और दबाव में संयम उन्हीं शुरुआती संघर्षों की देन मानी जाती है.

चार देशों के बीच सबसे कठिन फैसला

ओलिसे के सामने सिर्फ क्लब करियर की चुनौती नहीं थी. अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में उन्हें चार देशों में से एक का चुनाव करना था. इंग्लैंड, जहां उनका जन्म हुआ और फुटबॉल सीखी. फ्रांस, जहां से उनकी मां का संबंध था और जिनके महान खिलाड़ी जिनेदिन जिदान उनकी प्रेरणा रहे. अल्जीरिया, जो उनकी मातृ विरासत का हिस्सा था और नाइजीरिया, जहां से उनके पिता का रिश्ता जुड़ा था. यह सिर्फ जर्सी चुनने का फैसला नहीं था. यह तय करने का वक्त था कि उनकी पहचान आखिर किस देश से जुड़ती है.

आखिर क्यों चुना फ्रांस?

हर खिलाड़ी बड़े टूर्नामेंट जीतने वाली टीम का हिस्सा बनना चाहता है, लेकिन ओलिसे का फैसला सिर्फ ट्रॉफियों से प्रभावित नहीं था. उन्हें फ्रांस की फुटबॉल शैली अपने खेल के सबसे करीब लगी. रचनात्मकता, गेंद पर नियंत्रण, खिलाड़ियों के बीच तालमेल और खुलकर खेलने की आजादी ने उन्हें फ्रांस की ओर खींचा. यही वजह रही कि उन्होंने आखिरकार फ्रांस का प्रतिनिधित्व करने का फैसला किया.

अब फ्रांस के खेल की अहम कडी हैं ओलिसे

आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. जिस खिलाड़ी को कभी अकादमियों ने ठुकराया था, वही अब फ्रांस की नई फुटबॉल सोच का अहम हिस्सा है. कोच डिडिएर डेसचैम्प्स की रणनीति में ओलिसे सिर्फ विंगर नहीं हैं. वे टीम के खेल की गति तय करते हैं. कब हमला तेज करना है, कब खेल को रोकना है और कब निर्णायक पास देना है, यह जिम्मेदारी अक्सर उनके कंधों पर रहती है.

नई पीढ़ी का सबसे बड़ा रचनात्मक खिलाड़ी

फुटबॉल विशेषज्ञ अब ओलिसे को उन खिलाड़ियों में शामिल करते हैं, जो आने वाले वर्षों में खेल की रचनात्मक कमान संभालेंगे. उनकी सबसे बड़ी ताकत सिर्फ ड्रिब्लिंग नहीं, बल्कि खेल को पढ़ने की क्षमता है. वह जानते हैं कि कब गेंद रोकनी है, कब पास देना है और कब खुद आगे बढ़ना है. यही समझ उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाती है.

दबाव जितना बड़ा, प्रदर्शन उतना बेहतर

बड़े टूर्नामेंटों में अक्सर खिलाड़ी दबाव में बिखर जाते हैं. ओलिसे ने इसके उलट हर बड़े मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है. वह सिर्फ मौके नहीं बनाते, बल्कि पूरे आक्रमण की दिशा बदलने की क्षमता रखते हैं. यही वजह है कि उन्हें आधुनिक फुटबॉल के सबसे प्रभावशाली रचनात्मक खिलाड़ियों में गिना जाने लगा है.

हर भूमिका निभाने वाला आधुनिक अटैकर

ओलिसे की सबसे बड़ी खूबी उनकी बहुमुखी प्रतिभा है. विंग से हमला करना हो, बीच से खेल को नियंत्रित करना हो, गोल का मौका बनाना हो या खुद फिनिश करना हो, वह हर भूमिका में सहज दिखाई देते हैं. यही लचीलापन उन्हें आधुनिक फुटबॉल का बेहद मूल्यवान खिलाड़ी बनाता है. किसी युवा खिलाड़ी के लिए इससे बड़ी पहचान शायद ही हो सकती है कि खेल के महान खिलाड़ी उसके खेल की खुलकर तारीफ करें. जिनेदिन जिदान जैसे दिग्गज भी ओलिसे की खेल समझ और अंतिम पास देने की क्षमता की सराहना कर चुके हैं. यह सम्मान सिर्फ प्रतिभा का नहीं, बल्कि उस लंबे सफर का भी है, जो एक रिजेक्ट हुए खिलाड़ी से शुरू होकर आज फ्रांस के सबसे भरोसेमंद सितारों तक पहुंचा है.

माइकल ओलिसे की कहानी बताती है कि कभी-कभी सबसे बड़ी पहचान उसी खिलाड़ी को मिलती है, जिसे शुरुआत में सबसे ज्यादा बार ठुकराया गया हो.
 

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