वांगला उत्सव में होती है फसल के देवता की पूजा, करते है उन्हें धन्यवाद

वांगला उत्सव में देवता को मिट्टी की उर्वरता और समृद्ध फसल के लिए धन्यवाद दिया जाता है. इस त्योहार को 100 ड्रम फेस्टिवल के नाम से भी जाना जाता है. हर साल इसे नवंबर महीने के दूसरे सप्ताह में मनाया जाता है. 

वांगला उत्सव में होती है फसल के देवता की पूजा, करते है उन्हें धन्यवाद

हर साल इसे नवंबर महीने के दूसरे सप्ताह में मनाया जाता है. 

नई दिल्ली :

वांगला पर्व फसलों की कटाई के बाद मनाया जाने वाला एक त्योहार है. मुख्य रूप से मेघालय राज्य में इसे पूरे धूमधाम के साथ मनाया जाता है. वहीं असम के कुछ हिस्सों में भी इसे मनाया जाता है. ये गारो समुदाय का सबसे बड़ा त्योहार है. गारो जनजाति के लोग इस दिन 'सालजोंग' नामक देवता की पूजा करते हैं, जो फसल के अधिदेवता भी माने जाते हैं. देवता को मिट्टी की उर्वरता और समृद्ध फसल के लिए धन्यवाद दिया जाता है. इस त्योहार को 100 ड्रम फेस्टिवल के नाम से भी जाना जाता है. हर साल इसे नवंबर महीने के दूसरे सप्ताह में मनाया जाता है. 

दिलचस्प पोशकें पहनकर आदिवासी धुनों पर होता है नृत्य
वांगला महोत्सव वह अवसर है जब आदिवासी अपने मुख्य देवता सालजोंग को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं. ये उत्सव आम तौर पर दो दिनों के लिए मनाया जाता है लेकिन कभी-कभी एक सप्ताह तक भी जारी रहता है. पहले दिन होने वाले समारोह को 'रागुला' कहते हैं, जो मुखिया के घर के अंदर किया जाता है. दूसरे दिन के समारोह को "कक्कट" कहा जाता है. पंख वाले हेडगियर्स के साथ रंगीन कपड़ों में युवाओं से लेकर बुजुर्ग सभी सज-धज कर तैयार होते हैं और लंबे अंडाकार आकार के ड्रमों पर बजाए जाने वाले संगीत की धुन पर नृत्य करते हैं.

वांगला उत्सव का महत्व


वांगला उत्सव मुख्य रूप से मेघालय में गारो जनजाति की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने और उसे बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता रहा है. यह क्षेत्र की संस्कृति और परंपरा को दिखाने का एक अवसर होता है. इस त्योहार का आकर्षण यहां का पारंपरिक संगीत है. इस उत्सव के दौरान ड्रम और बांसुरी के साथ एक संगीतमय कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है, जिसके साथ ये उत्सव पूरा होता है. गारो जनजाति के लिए ये आनंद के दिन होते हैं. उत्सव के इन दिनों में ड्रम की धुन से पहाड़ गूंज उठते हैं. इस त्योहार के दौरान क्षेत्र के लोकप्रिय नृत्य रूपों का प्रदर्शन किया जाता है. इसमें मुख्य रूप से दो समानांतर रेखाओं की एक कतार होती है - एक पुरुष और दूसरी महिलाओं की, जो पारंपरिक परिधानों में खूब सजे-धजे होते हैं. पुरुषों की 'ऑर्केस्ट्रा' में ड्रम, घंटे और बांसुरी शामिल होते हैं. इस तरह ये त्योहार मेघालय की परंपरा से जुड़ा है. 

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