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जुलाई में रोहिणी प्रदोष व्रत कब है? जानिए तिथि, व्रत का महत्व और पौराणिक कथा

प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है, जो भक्त प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के समय में पूरी निष्ठा के साथ महादेव की पूजा करते हैं, उनके सभी कष्ट दूर होते हैं. जानिए जुलाई में प्रदोष व्रत कब है.

जुलाई में रोहिणी प्रदोष व्रत कब है? जानिए तिथि, व्रत का महत्व और पौराणिक कथा
रोहिणी प्रदोष व्रत
file photo

हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का बहुत खास महत्व माना जाता है. हर महीने में दो बार प्रदोष व्रत आता है. हर महीने में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है. यह व्रत भगवान भोलेनाथ को समर्पित होता है. धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से प्रदोष व्रत रखते हैं और प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करते हैं, उनके जीवन की परेशानियां धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं. साथ ही घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है. हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, जुलाई में रवि प्रदोष व्रत यानी त्रयोदशी तिथि 12 जुलाई को पड़ रहा है. इस दिन रोहिणी नक्षत्र और रविवार का शुभ संयोग होने के कारण इसे रोहिणी प्रदोष और रवि प्रदोष व्रत माना जाता है.

जुलाई प्रदोष व्रत की तिथियां

  • जुलाई में दो प्रदोष व्रत पड़ रहे हैं.
  • पहला प्रदोष व्रत 12 जुलाई 2026 (रविवार)
  • दूसरा प्रदोष व्रत: 26 जुलाई 2026 (रविवार)

पूजा का शुभ मुहूर्त (12 जुलाई)

प्रदोष काल पूजा मुहूर्त- शाम 07:22 से रात 09:24 तक

त्रयोदशी तिथि प्रारंभ- 12 जुलाई, प्रातः 02:04 बजे

त्रयोदशी तिथि समाप्त- 12 जुलाई, रात्रि 10:29 बजे

व्रत का महत्व

प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है, जो भक्त प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के समय में पूरी निष्ठा के साथ महादेव की पूजा करते हैं, उनके सभी कष्ट दूर होते हैं. इस व्रत को करने से आरोग्य, धन-धान्य की प्राप्ति होती है और वैवाहिक जीवन में मधुरता बनी रहती है.

प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा

शिव पुराण की कथा के अनुसार, एक बार एक गरीब ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा मांगकर लौट रही थी, तभी उसे विदर्भ देश का राजकुमार मिला, जिसके पिता को शत्रुओं ने मार दिया था और उसका राज्य छीन लिया था. ब्राह्मणी उस राजकुमार को अपने साथ ले आई और उसे अपने पुत्र की तरह पाला. एक दिन दोनों बालक शांडिल्य ऋषि के आश्रम पहुंचे, जहां ऋषि ने उन्हें प्रदोष व्रत की विधि और इसके महत्व के बारे में बताया. इसके बाद दोनों राजकुमारों ने प्रदोष व्रत करना शुरू कर दिया. व्रत के प्रभाव से राजकुमार को गंधर्वराज की कन्या से विवाह का प्रस्ताव मिला और बाद में उसने अपनी खोई हुई सेना तथा राज्य को शत्रुओं से वापस जीत लिया. तभी से यह मान्यता है कि प्रदोष व्रत करने वाले हर भक्त की मनोकामना पूरी होती है.

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