What is salvation in Hinduism: भारतीय संस्कृति में मानव जीवन को एक सुंदर अवसर माना गया है. हमारे ऋषि-मुनियों ने कहा है जीवन केवल खाने-पीने, धन कमाने और इच्छाओं की पूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका एक उच्च उद्देश्य है. इसी उद्देश्य को समझाने के लिए भारतीय चिंतन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चार पुरुषार्थों की व्यवस्था दी गई है. धर्म जीवन को मर्यादा देता है, अर्थ जीवन-निर्वाह का आधार बनता है, काम उचित इच्छाओं की पूर्ति का साधन है, जबकि मोक्ष मानव जीवन का अंतिम और परम लक्ष्य है.
मोक्ष का अर्थ क्या है?
मोक्ष का अर्थ है जन्म-मरण के बंधन, अज्ञान, अहंकार, मोह और आसक्ति से मुक्त होकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करना. उपनिषदों के अनुसार जब मनुष्य यह जान लेता है कि आत्मा शाश्वत है और वही परम ब्रह्म का स्वरूप है, तब वह मोक्ष को प्राप्त करता है. मोक्ष का एक दूसरा पक्ष जीवन में आंतरिक शांति, और आत्मबोध का अनुभव भी है.
मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है-
भिद्यते हृदयग्रन्थि: छिद्यन्ते सर्वसंशया:. क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे॥ (2.2.8)
अर्थात्- परम ब्रह्म का साक्षात्कार होने पर अज्ञान की गाँठें खुल जाती हैं, सभी संदेह समाप्त हो जाते हैं और कर्मबंधनों का नाश हो जाता है. यही मोक्ष की अवस्था है.
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थय:. अथ मत्र्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम्॥ (कठोपनिषद् 2.3.15)
अर्थात्- जब मनुष्य के हृदय से अज्ञान, मोह और अहंकार की सभी परतें खुल जाती हैं, तब वह अमृतस्वरूप होकर मोक्ष को प्राप्त करता है.
मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थिति:. भागवत पुराण (2.10.6)
अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाना ही मुक्ति या मोक्ष है. पुराणों के अनुसार ईश्वर-भक्ति, सत्य, करुणा, सेवा, सत्संग और निष्काम कर्म मनुष्य के अंत:करण को शुद्ध करते हैं. शुद्ध अंत:करण में आत्मज्ञान का प्रकाश होता है और वही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है.
किन चीजों से चाहिए मोक्ष?
वर्तमान युग में मनुष्य भौतिक सुविधाओं से संपन्न होने पर भी तनाव, भय, असंतोष और प्रतिस्पर्धा से घिरा हुआ है. ऐसे समय में मोक्ष की अवधारणा अत्यंत प्रासंगिक है. इसका अर्थ संसार का त्याग करना नहीं, बल्कि लोभ, क्रोध, ईष्र्या और अहंकार जैसे मानसिक बंधनों से मुक्त होना है और सत्य, प्रेम, करुणा और सेवा के साथ जीवन जीना है. जब मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करता है, आत्मचिंतन करता है और ईश्वर के प्रति श्रद्धा बनाए रखता है, तब उसके जीवन में शांति, संतुलन और आनंद का उदय होता है.
ऋषियों ने कहा है कि वास्तविक सुख बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, ईश्वर से एकत्व और समस्त प्राणियों के प्रति प्रेमपूर्ण दृष्टि में निहित है. यही मानव जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ है. मोक्ष प्राप्त करने के लिए किसी विशेष स्थान पर जाने की आवश्यकता नहीं है. अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाना, अच्छे विचार रखना, दूसरों के प्रति संवेदनशील होना, आत्मचिंतन करना और जीवन को सेवा के लिए समर्पित करना ही मोक्ष की ओर बढऩे के सरल मार्ग हैं.
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अपने भीतर छिपी दिव्यता को जगाने की यात्रा यानि मोक्ष
युगऋषि पं श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपनी पुस्तक तत्वदृष्टि से बंधन मुक्ति में लिखते हैं यदि मनुष्य जीवन से दु:खों का तिरोधान हो जाए, तो वह मोक्ष की स्थिति में अवस्थित हो जायेगा. दु:खों का अभाव ही आनंद है. अर्थात् मोक्ष और आनंद एक दूसरे के पर्याय हैं. इस प्रकार यदि जीवन के दु:खों को नष्ट किया जा सके, तो आनंद वाली मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है. वे आगे लिखते हैं कि मोक्ष कोई रहस्यमय या कठिन लक्ष्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपी दिव्यता को जागृत करने की प्रक्रिया का नाम है. जब व्यक्ति अपने जीवन को श्रेष्ठ विचारों और श्रेष्ठ कर्मों से भर देता है, तब वह आनंद का अनुभव करता है.
लेखक- देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति एवं प्रसिद्ध आध्यात्मिक विचारक हैं.
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