हिन्दू धर्म में हर महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक दुर्गा अष्टमी मनाई जाती है. इस दिन मां दुर्गा की पूजा करने का विधान है. माना जाता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन सच्चे मन और श्रद्धा-भाव से माता रानी की पूजा करता है, उसके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती हैं. पंचांग के अनुसार फिलहाल आषाढ़ महीना चल रहा है और आज यानी 21 जुलाई को इस माह की दुर्गा अष्टमी मनाई जा रही है. इसी कड़ी में आज हम आपको मासिक दुर्गा अष्टमी का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और मंत्र बताने जा रहे हैं. आइए जानते हैं...
मासिक दुर्गा का शुभ मुहूर्त
मासिक दुर्गा अष्टमी पर पूजा का मुहूर्त सुबह 4 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक रहेगा. इसके अलावा भक्त अभिजीत मुहूर्त में यानी दिन में 11:47 बजे से 12:35 बजे तक की अवधि में भी पूजा कर सकते हैं.
पूजा विधि
- ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके स्वच्छ (लाल या पीले) वस्त्र धारण करें.
- पूजा स्थल पर लाल रंग का आसन बिछाकर मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें.
- मां को लाल पुष्प (गुड़हल के फूल विशेष शुभ हैं), सिंदूर, रोली, अक्षत और चुनरी अर्पित करें. भोग में फल, मिठाई और नारियल चढ़ाएं.
- देसी घी का दीपक और धूप जलाएं. 'ॐ दुं दुर्गाय नमः' मंत्र का 108 बार जाप करें और दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें.
मां दुर्गा के मंत्र
- सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते॥
- देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
- ॐ सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो, धन धान्यः सुतान्वितः।मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥
- या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
- ॐ दुं दुर्गायै नमः
मां दुर्गा की आरती
जय अंबे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ ओम जय अंबे गौरी
मांग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्जवल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥ ओम जय अंबे गौर
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥ ओम जय अंबे गौरी
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्परधारी।
सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहारी॥ ओम जय अंबे गौरी
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चन्द्र दिवाकर,
सम राजत ज्योति॥ ओम जय अंबे गौरी
शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती। धूम्र विलोचन नैना,
निशिदिन मदमाती॥ ओम जय अंबे गौरी
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ ओम जय अंबे गौरी
ब्रहमाणी रुद्राणी तुम कमला रानी।
आगम-निगम-बखानी, तुम शिव पटरानी॥ ओम जय अंबे गौरी
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरूं।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरु॥ ओम जय अंबे गौरी
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दु:ख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥ ओम जय अंबे गौरी
भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी।
मनवान्छित फल पावत, सेवत नर-नारी॥ ओम जय अंबे गौरी
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥ ओम जय अंबे गौरी
श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै॥ ओम जय अंबे गौरी, ओम जय अंबे गौरी
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.
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