ओडिशा के पवित्र धाम पुरी में विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा का महाउत्सव अपने अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच चुका है. भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ नौ दिनों तक अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर में विश्राम करने के बाद अब अपने मुख्य धाम यानी श्री मंदिर (जगन्नाथ मंदिर) की ओर प्रस्थान कर रहे हैं.
बहुड़ा यात्रा शुरू
भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा की बहुड़ा यात्रा आज शुक्रवार को पूरे धार्मिक उत्साह और भक्ति के माहौल में शुरू हुई. नौ दिनों तक श्री गुंडिचा मंदिर में विराजमान रहने के बाद अब तीनों देवता अपने मूल धाम श्री मंदिर की ओर लौट रहे हैं. शुक्रवार सुबह पारंपरिक पूजा-अर्चना के साथ यात्रा की शुरुआत हुई. इस दौरान बड़ी संख्या में भक्त पहुंचे. वहीं, भक्तों की संख्या को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था के भी खास इंतजाम किए गए हैं.
बहुड़ा यात्रा का आध्यात्मिक महत्व और पौराणिक मान्यताएं
बहुड़ा यात्रा भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का वापसी पर्व है, जो गुंडिचा मंदिर से मुख्य मंदिर की ओर प्रभु की घर वापसी का प्रतीक है. यह यात्रा दर्शाती है कि जीव की हर यात्रा का अंतिम लक्ष्य अपने मूल आध्यात्मिक धाम लौटना है. शास्त्रों में जगन्नाथ रथ यात्रा के दर्शन का जितना महत्व बताया गया है, उससे कहीं अधिक फलदायी 'बहुड़ा यात्रा' या उलटे रथ के दर्शन को माना गया है.
धाम वापसी का प्रतीक- भगवान का अपने जन्म स्थान व मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) से मुख्य श्रीमंदिर लौटना जीव की आत्मा का परमात्मा में लीन होने या अपने मूल स्रोत की ओर लौटने का द्योतक है.
मोक्ष की प्राप्ति- मान्यता है कि जो श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ को मौसी के घर से वापस अपने मुख्य धाम लौटते हुए रथ पर विराजमान देखते हैं, उन्हें सौ यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है और वे जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाते हैं.
श्री मंदिर में पुनः प्रवेश- वापसी के बाद भगवान सीधे मंदिर के भीतर नहीं जाते. अगले दिन रथों पर ही उनका 'सुन बेष' यानी सोने का भव्य श्रृंगार होता है. इसके बाद 'अधर पणा' और अंत में 'नीलाद्री बीजे' की रस्म के साथ भगवान रत्न सिंहासन पर दोबारा विराजमान होते हैं.
लीला का समापन- यह नौ दिवसीय देव-लीला का समापन चरण है, जिसके बाद भगवान के स्वर्ण श्रृंगार और गर्भगृह में प्रवेश के अंतिम अनुष्ठान होते हैं.
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