Ishwar Ka Vidhan Kya Hota Hai: भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का मूल संदेश यह है कि ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और करुणामय है. अतः उसके द्वारा किया गया प्रत्येक निर्णय जीव के अंतिम कल्याण के लिए ही होता है. मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि और क्षणिक दृष्टि के कारण कई बार ईश्वर की योजना को भले ही तुरंत न समझ पाता हो लेकिन समय आने पर वही घटनाएं उसके जीवन को नई दिशा और गहराई प्रदान करती हैं. यही कारण है कि धर्मशास्त्र हमें धैर्य, प्रतीक्षा और भक्ति के माध्यम से ईश्वररीय कृपा को समझने की शिक्षा देते हैं. आइए ईश्वरीय विधान और उससे होने वाले कल्याण के बारे में जाने-माने संत स्वामी श्री चिदम्बरानन्द सरस्वती जी महाराज से विस्तार से समझते हैं.
सब्र का फल हमेशा मीठा होता है
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि -
'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज. अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥' (गीता 18.66)
इस श्लोक का भाव यह है कि जब मनुष्य पूर्ण रूप से ईश्वर की शरण में जाता है, तब उसे किसी भी प्रकार की चिंता या भय नहीं रहता है. ईश्वर का निर्णय भले ही आपको तत्काल सुखद प्रतीत न हो, लेकिन अंत में वही मोक्ष और कल्याण का मार्ग बनता है. इसके लिए हमें बस प्रतीक्षा करनी होती है, इसीलिए कहा जाता है कि सब्र का फल मीठा होता है.
गूढ़ रहस्यों को समझें
जीवन में कई बार कष्ट, असफलता और प्रतीक्षा आती है. उपनिषद् हमें सिखाते हैं -
'श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्' (गीता 4.39)
अर्थात् श्रद्धा और धैर्य रखने वाला ही सच्चे ज्ञान को प्राप्त करता है. प्रतीक्षा केवल निष्क्रियता नहीं है, बल्कि वह विश्वास की परीक्षा है. भक्त जब धैर्य रखते हुए ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करता है, तब उसका अंतर्मन परिपक्व होता है और वह जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने लगता है.
ईश्वर का प्रसाद
रामायण में भगवान राम का वनवास इस बात का श्रेष्ठ उदाहरण है. भगवान राम को मिला वनवास तत्काल दृष्टि से भले ही अन्याय और दुःख का कारण प्रतीत होता है, लेकिन इसी वनवास ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को लोककल्याण का आदर्श बनाया. तुलसीदास जी कहते हैं -
'होइहै सोई जो राम रचि राखा.'
अर्थात् जो भी होता है, वह ईश्वर की योजना के अनुसार ही होता है. इस भाव के पीछे यह समझ है कि ईश्वर जो भी देता है, वह हमारे कल्याण के लिए होता है.
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सुख और दुख समान भाव रखें
सुख हमें कृतज्ञ बनाता है और दुख हमें धैर्य, विवेक व आत्मबल सिखाता है. जब हम हर स्थिति को प्रसाद मानकर स्वीकार करते हैं, तो मन शांत रहता है और अहंकार व शिकायत कम होती है. यह दृष्टि गीता के समत्व भाव से भी जुड़ी है - 'सुख-दुःखे समे कृत्वा' - सुख और दुख को समान भाव से स्वीकार करना.
प्रतीक्षा का महत्व है
भक्ति में प्रतीक्षा का विशेष महत्व होता है. भागवत पुराण में प्रह्लाद की कथा बताती है कि ईश्वर की कृपा में भले ही कुछ देर होती हुई नजर आए लेकिन कभी भी वह टलती नहीं. जब भक्त ईश्वर के निर्णयों की समीक्षा श्रद्धा और अनुभव के साथ करता है, तब उसे यह बोध होता है कि हर कष्ट ने उसे अधिक मजबूत, विनम्र और जागरूक बनाया.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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