विज्ञापन

Sant Ki Seekh: इच्छा और जरूरत में क्या अंतर है? अगर समझ लिया तो सफलता आपके कदम चूमेगी

Desire And Need: इच्छा और जरूरत दो ऐसे शब्द हैं, जिनका जुड़ाव हर इंसान से बना रहता है. ये दोनों ही शब्द भले ही समान प्रतीत होते हों लेकिन इनमें बड़ा अंतर होता है. जीवन से जुड़ी आवश्यकताओं को जहां ईश्वर किसी न किसी रूप से पूरा करता है तो कामनाएं हमें दुख की ओर ढकेलती हैं. इच्छा और आवश्यकता के बीच का फर्क समझने के लिए पढ़ें ये लेख. 

Sant Ki Seekh: इच्छा और जरूरत में क्या अंतर है? अगर समझ लिया तो सफलता आपके कदम चूमेगी
Sant Ki Seekh: इच्छा और जरूरत में क्या अंतर है?
NDTV

Jarurat aur ichcha mein kya antar hai: मनुष्य के जीवन में आवश्यकता और इच्छा - ये दोनों शब्द अक्सर एक जैसे प्रतीत होते हैं, लेकिन इनके अर्थ, प्रभाव और परिणाम एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं. श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से इन दोनों के स्वरूप को समझाया है और बताया है कि आवश्यकता के अनुसार जीवन जीने वाला व्यक्ति कैसे शांति प्राप्त करता है, जबकि इच्छाओं में फंसा मनुष्य अपने जीवन को कैसे नष्ट कर लेता है. आइए जाने-माने संत स्वामी श्री चिदम्बरानन्द सरस्वती जी महाराज से इंसान की आवश्यकता और इच्छाओं के बीच का बड़ा फर्क विस्तार से समझते हैं.

आवश्यकता ईश्वर पर आश्रित होती है 

आवश्यकता वह है जो जीवन के संतुलन और निर्वाह के लिए अनिवार्य है - जैसे भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य और आत्मिक शांति. आवश्यकता सीमित होती है और प्रकृति के नियमों के अनुरूप होती है. जब मनुष्य अपनी आवश्यकताओं तक सीमित रहता है, तब ईश्वर स्वयं उसकी व्यवस्था करते हैं. गीता में भगवान कहते हैं-

'अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते.
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥' (गीता 9.22)

अर्थात जो मनुष्य अनन्य भाव से मेरा चिंतन करता है, उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति और संरक्षण का भार मैं स्वयं उठाता हूँ. यह श्लोक बताता है कि आवश्यकता ईश्वर-आश्रित होती है; जब मनुष्य विश्वास और संतोष के साथ जीवन जीता है, तो भगवान उसकी आवश्यकता पूर्ण करते हैं.

इच्छा एक असीमित लालसा है
इसके विपरीत इच्छा मन की असीमित लालसा है. इच्छा कभी समाप्त नहीं होती-एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी जन्म ले लेती है. इच्छाएं मनुष्य को भोग, संग्रह और प्रतिस्पर्धा की ओर ले जाती हैं. गीता में कहा गया है-

'ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते.
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥' (गीता 2.62)

अर्थात विषयों का चिंतन करने से आसक्ति उत्पन्न होती है, आसक्ति से कामना (इच्छा) जन्म लेती है और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है. यही क्रोध आगे चलकर विवेक का नाश कर देता है और मनुष्य पतन की ओर बढ़ता है.

सच्चे अर्थों में सुखी कौन?

इच्छा के पीछे भागते-भागते मनुष्य अपने जीवन की ऊर्जा, समय और शांति खो देता है. वह अधिक पाने की होड़ में स्वास्थ्य, रिश्ते और नैतिक मूल्यों को भी त्याग देता है. गीता में भगवान स्पष्ट कहते हैं-

'काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः.' (गीता 3.37)

अर्थात इच्छा और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न होते हैं और यही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं. इच्छाओं की आग में जलता हुआ व्यक्ति कभी तृप्त नहीं होता और अंततः उसका जीवन अशांत, तनावग्रस्त और दिशाहीन हो जाता है.

ईश्वर की कृपा का पात्र

इसके विपरीत, जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को पहचानता है और इच्छाओं पर संयम रखता है, वही सच्चे अर्थों में सुखी होता है. गीता में कहा गया है-

'विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः.
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥' (गीता 2.71)

जो सभी इच्छाओं को त्यागकर, ममता और अहंकार से रहित होकर जीवन जीता है, वही शांति को प्राप्त करता है.

आवश्यकता जीवन को संतुलित और पवित्र बनाती है तथा ईश्वर उसकी पूर्ति स्वयं करते हैं, जबकि इच्छा जीवन को बंधन, अशांति और अंततः विनाश की ओर ले जाती है. इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह आवश्यकता और इच्छा के अंतर को समझे, इच्छाओं पर संयम रखे और संतोषपूर्ण जीवन जीकर ईश्वर की कृपा का पात्र बने.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com