कांवड़ यात्रा के दौरान आपने अक्सर डाक कांवड़, खड़ी कांवड़ और दांडी कांवड़ जैसे नाम सुने होंगे. क्या आप जानते हैं कि इन सभी यात्राओं के नियम और कठिनाई का स्तर अलग-अलग होता है. सावन में लाखों शिवभक्त अपनी श्रद्धा और संकल्प के अनुसार कांवड़ यात्रा करते हैं. ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय ने बताया कि कांवड़ यात्रा केवल गंगाजल लाने की परंपरा नहीं, बल्कि संयम, तपस्या और भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक है.
कब शुरू होगी कांवड़ यात्रा 2026
ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय ने बताया कि साल 2026 में कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से शुरू होगी और 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि के दिन समाप्त होगी. इसी दिन श्रद्धालु भगवान शिव का गंगाजल से जलाभिषेक करेंगे.
क्या होती है डाक कांवड़
उन्होंने बताया कि डाक कांवड़ सबसे तेज गति से पूरी की जाने वाली यात्रा मानी जाती है. इसमें श्रद्धालु बिना रुके लगातार दौड़ते या तेज कदमों से चलते हुए गंगाजल लेकर सीधे शिव मंदिर पहुंचते हैं. यात्रा के दौरान विश्राम नहीं किया जाता.
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खड़ी कांवड़ कैसे होती है अलग
खड़ी कांवड़ का सबसे बड़ा नियम है कि कांवड़ को जमीन पर नहीं रखा जाता. यदि एक श्रद्धालु थक जाए तो दूसरा साथी कांवड़ अपने कंधे पर उठा लेता है. यह यात्रा अनुशासन, सहयोग और सेवा भाव का प्रतीक मानी जाती है.
सबसे कठिन कौन-सी मानी जाती है कांवड़
पंडित कौशल पांडेय के अनुसार, दांडी कांवड़ सबसे कठिन मानी जाती है. इसमें श्रद्धालु दंडवत प्रणाम करते हुए पूरी यात्रा तय करते हैं. यह तपस्या कई दिनों या हफ्तों तक चल सकती है और इसे अत्यंत कठिन व्रत माना जाता है. उन्होंने आगे कहा कि कांवड़ यात्रा का महत्व उसकी कठिनाई में नहीं, बल्कि श्रद्धा, नियमों के पालन और भगवान शिव के प्रति समर्पण में है. भक्त अपनी क्षमता और संकल्प के अनुसार किसी भी प्रकार की कांवड़ यात्रा कर सकते हैं.
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