
Bhishma Dwadashi Date: हिंदू पंचाग में माघ माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीष्म द्वादशी के तौर पर मनाया जाता है. इसे आमलकी द्वादशी और तिल द्वादशी भी कहते हैं. इससे एक दिन पहले जया एकादशी का व्रत पड़ता है और द्वादशी तिथि में एकादशी व्रत का पारण किया जाता है. मान्यता है कि माघी शुक्ल की द्वादशी के दिन महाभारत काल के भीष्म की मरणोंप्रांत धार्मिक कार्य किए गए थे. इसलिए इसे भीष्म एकादशी कहा जाता है.

इस बार तिथि को लेकर संशय क्यों?
2023 में माघ शुक्ल की द्वादशी दरअसल एकादशी तिथि की दोपहर को ही आरंभ हो रही है. इसलिए द्वादशी तिथि एक फरवरी को एकादशी वाले दिन ही दोपहर 2.04 मिनट उदय हो जाएगी और अगले दिन 4.27 मिनट पर समाप्त होगी. इसलिए द्वादशी का व्रत 2 फरवरी को रखा जाएगा और इसी दिन जया एकादशी के व्रत का पारण भी होगा. आपको बता दें कि हमारे यहां उस तिथि को प्राथमिकता दी जाती है जिसमे सूर्य उगता है. इसलिए 2 फरवरी को ही भीष्म द्वादशी मनाई जाएगी.
आमलकी द्वादशी का महत्व
भीष्म एकादशी को आमलकी द्वादशी भी कहा जाता है और इसे तिल द्वादशी भी कहा जाता है. इस दिन तिल का दान करना सर्वश्रेष्ठ दान कहा गया है जिससे आने वाली सभी पीढ़ियों को कई गुणा पुण्य मिलता है.
पद्मपुराण में कहा गया है कि भीष्म एकादशी के दिन किए पूजा पाठ के बाद पितरों को तर्पण करना चाहिए. इस दिन पितरों का तर्पण करने पर परिवार को पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और पारिवारिक सदस्यों को आरोग्य का वरदान मिलता है. इस दिन लोटे में तिल मिलाकर तर्पण करना चाहिए, इससे भटक रहे पितरों को वैकुंठलोक प्राप्त होता है.
पद्मपुराण में कहा गया है कि भीष्म एकादशी के दिन भगवान कृष्ण की पूजा करनी चाहिए. भगवान कृष्ण भगवान विष्णु के ही अवतार हैं औऱ उनकी पूजा से ईश्वर प्रसन्न होकर जातक के सभी पितरों को स्वर्गलोक में स्थान देते हैं. इतना ही नहीं इस दिन तिल के तेल से मालिश करना और तिल मिले पानी से स्नान करना भी काफी महत्वपूर्ण कहा गया है.
इस दिन सुबह उठकर भगवान कृष्ण की पूजा करने के उपरांत भीष्म एकादशी की कथा सुनें. सूर्य भगवान को तिल मिला जल अर्पण करें और भगवान का भजन करना हितकर होता है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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