Shankaracharya Jayanti 2026: श्री आदि शंकराचार्य का जन्म सन् 788 ईस्वी में केरल के एर्नाकुलम जिले के कालडी नामक गांव में हुआ था. उन्होंने सनातन धर्म को पुनर्जीवित किया. उन्होंने मात्र 32 वर्षों के अल्प जीवन में देशभर में चार मठ स्थापित किए और उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र व गीता पर भाष्य लिखे. शंकराचार्य जयंती 2026 देशभर में 21 अप्रैल 2026 को मनाई जाएगी. यह दिन आदि गुरु शंकराचार्य जी की जयंती के रूप में बहुत ही धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, आदि शंकराचार्य जी का जन्म वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हुआ था. वर्ष 2026 में उनकी 1238वीं जयंती मनाई जाएगी.
शंकराचार्य जयंती 2026: तिथि और समय
- पंचमी तिथि शुरू: 21 अप्रैल 2026, सुबह 4:14 बजे
- पंचमी तिथि समाप्त: 22 अप्रैल 2026, रात 1:19 बजे
शंकराचार्य जयंती 2026 का महत्व
शंकराचार्य जयंती हिंदू धर्म में बहुत ही पवित्र और खास मानी जाती है. इस दिन आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ था. वे हिंदू धर्म के महान संत, गुरु और दार्शनिक थे. आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत का प्रचार किया, जिसने सनातन धर्म को गहराई से समझने की दिशा दी. उनका जन्म केरल के छोटे से गांव कालडी में हुआ था. उनकी माता का नाम आर्यांबा और पिता का नाम शिवगुरु था. उन्हें भारतीय धार्मिक इतिहास के सबसे महान गुरुओं और विद्वानों में गिना जाता है. उन्होंने परमात्मा, आत्मा, वैराग्य और मोक्ष जैसे गूढ़ विषयों पर लोगों को ज्ञान दिया. आदि शंकराचार्य को वेदों और उपनिषदों का गहरा ज्ञान था और उन्होंने इनके अर्थ को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाया. इसी कारण आज भी उनका योगदान हिंदू धर्म में बहुत आदर के साथ याद किया जाता है.
यह भी माना जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य का जीवन बहुत छोटा था. उन्होंने पंचायतन पूजा पद्धति की शुरुआत की, जिसमें भगवान शिव, देवी शक्ति, भगवान विष्णु, भगवान सूर्य और भगवान गणेश की पूजा की जाती है. ऐसा कहा जाता है कि शंकराचार्य जी ने केवल 16 वर्ष की उम्र में वेदों का गहरा ज्ञान प्राप्त कर लिया था. उन्होंने कई स्तोत्र, ग्रंथ और धार्मिक पुस्तकें लिखीं, जो आज भी हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं.
आदि शंकराचार्य इतिहासधर्म और आध्यात्मिक ज्ञान को फैलाने के उद्देश्य से आदि शंकराचार्य ने देश की चार दिशाओं में चार मठों की स्थापना की. कालिका मठ, गोवर्धन मठ, शारदा मठ और ज्योतिर्मठ. इन मठों की जिम्मेदारी उन्होंने अपने सबसे योग्य और समर्पित शिष्यों को सौंपी. उन्होंने उन्हें वेद, उपनिषद और अन्य पवित्र ग्रंथों का ज्ञान देकर समाज में धर्म का प्रचार करने के लिए तैयार किया. सनातन धर्म के चारों वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के प्रचार‑प्रसार में भी शंकराचार्य जी का बड़ा योगदान माना जाता है.
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