
नई दिल्ली:
दिल्ली में अभी भी हवा में जहर की मात्रा काफी है. अंदाजा लगाइए उनकी हालत क्या होगी जिनकी ज़िंदगी रोज सड़क से शुरू होती है और सड़क पर ही खत्म हो जाती है. लक्ष्मी दिल्ली के खानपुर चौराहे पर फूल बेचती है. चार छोटे बच्चे हैं.
कहती है प्रदूषण का नाम सुना है, लेकिन सड़क पर आना मजबूरी है. लक्ष्मी ने यहां तक कहा कि अगर सड़क पर ना बैठें तो बच्चे कैसे पालें और कैसे अपना गुजारा करें. ये समस्या अकेले लक्ष्मी की नहीं है. आईटीओ रेड लाइट पर भी ऐसे कई बच्चे और लड़के मिल जाते हैं जो गाड़ियां रुकते ही अपना सामान लेकर दौड़ पड़ते हैं.
मोबाइल चार्ज करने वाले केबल बेचने वाला विकास कहता है प्रदूषण क्या होता है. हमें तो कोई दिक्कत नहीं होती है. यहीं पर नीरज भी मिला. नाम तो इसने भी नही सुना है लेकिन इतना कहा कि आंखों में पानी तो आता है. ऐसा नहीं कि इन लोगों को इसकी क़ीमत न चुकानी पड़ती हो. दिल्ली की हवा में हर किसी का दम घुटता है.
इंडिया गेट पर ऑटो चलाने वाले राजन मिला और बोला, प्रदूषण के चलते वो ज्यादा देर काम नहीं कर पाता. शाम को जब घर जाता है तो बलगम बहुत आते हैं. वहीं कनॉट प्लेस में पानी बेचने वाले शोभाचंद्र ने कहा कि देखिए प्रदूषण से परेशानी तो है लेकिन अगर इस पर ज्यादा ध्यान देंगे तो रोजी रोटी कैसे चलेगी. जिनके पास साधन हैं वो मास्क लगाकर घूम रहे हैं. बच्चों के स्कूल बंद कर दिए गए. लेकिन सड़क किनारे रहने वालों को ज़िंदगी इतनी राहत देने को तैयार नहीं. उनकी हालत सबसे ख़राब है.
सीएसआई में रिसर्च एसोसिएट उस्मान नसीम कहते हैं कि वैसे तो एक स्टडी में पता चला है कि सड़क के किनारे 500 मीटर में प्रदूषण का असर होता है. रेडलाइट पर रहने वाले बच्चों की हालत तो बहुत ही खराब है. अगर जांच कराई जाए तो पता चलेगा कि कईयों के फेफड़े खराब हो चले हैं और कईयों को कई तरह की बीमारियों ने घेर रखा है. वैसे प्रदूषण पर बहस करने वाले अपनी गाड़ियों में निकल जाते हैं, इन पर उनकी नज़र नहीं पड़ती. प्रदूषण की सबसे ज्यादा मार इन पर पड़ती है और इन पर ही किसी की ही नजर नहीं है.
कहती है प्रदूषण का नाम सुना है, लेकिन सड़क पर आना मजबूरी है. लक्ष्मी ने यहां तक कहा कि अगर सड़क पर ना बैठें तो बच्चे कैसे पालें और कैसे अपना गुजारा करें. ये समस्या अकेले लक्ष्मी की नहीं है. आईटीओ रेड लाइट पर भी ऐसे कई बच्चे और लड़के मिल जाते हैं जो गाड़ियां रुकते ही अपना सामान लेकर दौड़ पड़ते हैं.
मोबाइल चार्ज करने वाले केबल बेचने वाला विकास कहता है प्रदूषण क्या होता है. हमें तो कोई दिक्कत नहीं होती है. यहीं पर नीरज भी मिला. नाम तो इसने भी नही सुना है लेकिन इतना कहा कि आंखों में पानी तो आता है. ऐसा नहीं कि इन लोगों को इसकी क़ीमत न चुकानी पड़ती हो. दिल्ली की हवा में हर किसी का दम घुटता है.
इंडिया गेट पर ऑटो चलाने वाले राजन मिला और बोला, प्रदूषण के चलते वो ज्यादा देर काम नहीं कर पाता. शाम को जब घर जाता है तो बलगम बहुत आते हैं. वहीं कनॉट प्लेस में पानी बेचने वाले शोभाचंद्र ने कहा कि देखिए प्रदूषण से परेशानी तो है लेकिन अगर इस पर ज्यादा ध्यान देंगे तो रोजी रोटी कैसे चलेगी. जिनके पास साधन हैं वो मास्क लगाकर घूम रहे हैं. बच्चों के स्कूल बंद कर दिए गए. लेकिन सड़क किनारे रहने वालों को ज़िंदगी इतनी राहत देने को तैयार नहीं. उनकी हालत सबसे ख़राब है.
सीएसआई में रिसर्च एसोसिएट उस्मान नसीम कहते हैं कि वैसे तो एक स्टडी में पता चला है कि सड़क के किनारे 500 मीटर में प्रदूषण का असर होता है. रेडलाइट पर रहने वाले बच्चों की हालत तो बहुत ही खराब है. अगर जांच कराई जाए तो पता चलेगा कि कईयों के फेफड़े खराब हो चले हैं और कईयों को कई तरह की बीमारियों ने घेर रखा है. वैसे प्रदूषण पर बहस करने वाले अपनी गाड़ियों में निकल जाते हैं, इन पर उनकी नज़र नहीं पड़ती. प्रदूषण की सबसे ज्यादा मार इन पर पड़ती है और इन पर ही किसी की ही नजर नहीं है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं