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जय भीम योजना क्‍या है, ज‍िसमें दिल्ली के 9 कोचिंग संचालकों ने कर डाला 37 करोड़ का महाघोटाला

delhi jai bhim yojana: दिल्ली सरकार की 'जय भीम मुख्यमंत्री प्रतिभा विकास योजना' में 37.20 करोड़ रुपये का बड़ा घोटाला सामने आया है. इस योजना का उद्देश्य गरीब और पिछड़े वर्ग के छात्रों को मुफ्त कोचिंग और स्टाइपेंड दिलाना था.

  • दिल्ली सरकार की जय भीम मुख्यमंत्री प्रतिभा विकास योजना में 37.20 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार सामने आया है
  • भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने 9 कोचिंग संस्थानों के संचालकों को फर्जीवाड़े के आरोप में गिरफ्तार किया है
  • योजना में छात्रों के नाम फर्जी तरीके से कई कोचिंग संस्थानों में दिखाकर सरकारी धन हड़पने का खुलासा हुआ है
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Jai Bhim Yojana Delhi: दिल्ली सरकार की एक ऐसी योजना, जिसका मकसद गरीब और पिछड़े वर्ग के होनहार छात्रों के सपनों को पंख देना था, उसे भ्रष्टाचार की दीमक ने खोखला कर दिया. जय भीम मुख्यमंत्री प्रतिभा विकास योजना (JBMPVY) में हुए 37.20 करोड़ रुपये के इस घोटाले ने शिक्षा जगत और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है. भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने इस मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए 9 रसूखदार कोचिंग संचालकों को सलाखों के पीछे भेज दिया है.

क्या है पूरा मामला और कैसे हुई गिरफ्तारी?

दिल्ली सरकार की महत्वाकांक्षी ‘जय भीम मुख्यमंत्री प्रतिभा विकास योजना' में बड़ा घोटाला सामने आया है. भ्रष्‍टाचार न‍िरोधक ब‍इयूरो (ACB) की टीम ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए 9 कोचिंग संस्थानों के मालिकों, डायरेक्टरों और उनसे जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया है. ये सभी संस्थान इस योजना के तहत साल 2018-19 में पैनल में शामिल किए गए थे. जांच में सामने आया है कि इन संस्थानों ने सरकारी पैसे को हड़पने के लिए बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा किया.

मामले की शुरुआत तब हुई जब अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग (DSCST), दिल्ली सरकार ने 7 अगस्त 2025 को एसीबी में एफआईआर दर्ज कराई. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कई पैनल में शामिल कोचिंग संस्थानों ने योजना के तहत सरकारी खजाने से पैसे लेने के लिए गड़बड़ी और धोखाधड़ी की.

योजना का सफर: सपनों की शुरुआत से घोटाले की नींव तक

जांच के दौरान पता चला कि इस योजना की शुरुआत साल 2017 में कैबिनेट के फैसले के बाद की गई थी और जनवरी 2018 में इसका नोटिफिकेशन जारी हुआ था. शुरुआत में इस योजना के तहत सिर्फ एससी वर्ग के छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग दी जानी थी, जिसके लिए 8 संस्थानों को चुना गया था. पहले चरण में करीब 5000 छात्रों का दाखिला हुआ. इस योजना के तहत कोचिंग फीस और छात्रों को मिलने वाला स्टाइपेंड सीधे संस्थानों को दिया जाता था.

बाद में 2019-20 में इस योजना को दोबारा शुरू किया गया, जिसमें एसटी, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस वर्ग को भी शामिल किया गया और 38 और कोचिंग संस्थानों को पैनल में जोड़ा गया. दोनों चरणों में कुल मिलाकर करीब 22 हजार छात्रों का नामांकन हुआ.

कैसे हुआ 37 करोड़ का हेरफेर?

जांच में सामने आया कि इन कोचिंग संस्थानों ने इस योजना के तहत करीब 37.20 करोड़ रुपये हासिल किए. लेकिन नियमों का पालन नहीं किया गया. हर संस्थान को इस योजना के लिए अलग बैंक खाता रखना जरूरी था, लेकिन ऐसा कहीं भी नहीं किया गया. सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब संस्थानों द्वारा दी गई छात्रों की लिस्ट की जांच की गई. पाया गया कि कई छात्रों के नाम एक से ज्यादा कोचिंग संस्थानों में दिखाए गए थे.

जब इन छात्रों को जांच में बुलाया गया, तो उन्होंने बताया कि उन्होंने किसी दूसरे संस्थान में दाखिला ही नहीं लिया था. इससे साफ हो गया कि संस्थानों ने फर्जी दस्तावेज बनाकर छात्रों के नाम दिखाए और सरकार से पैसे निकाल लिए. इतना ही नहीं, कई मामलों में छात्रों को मिलने वाला स्टाइपेंड भी उन्हें नहीं दिया गया और पैसा संस्थानों ने अपने पास ही रख लिया.

नियमों की धज्जियां और एसीबी की सख्त कार्रवाई

जांच में यह भी सामने आया कि कुछ कोचिंग संस्थानों ने छात्रों को खुद पढ़ाने के बजाय लोकल ट्यूशन सेंटर में भेज दिया, जो नियमों का सीधा उल्लंघन है. इन ट्यूशन सेंटर के संचालकों और संस्थानों के मालिकों को कई बार अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया, लेकिन वे कोई ठोस जवाब नहीं दे पाए.

हैरानी की बात यह भी है कि कुछ संस्थानों ने एफआईआर दर्ज होने के बाद छात्रों के खातों में स्टाइपेंड ट्रांसफर किया, जिससे यह शक और गहरा गया कि पहले जानबूझकर पैसे रोके गए थे. 29 अप्रैल 2026 को एसीबी ने इस मामले में 9 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. अगले दिन 30 अप्रैल को सभी आरोपियों को स्पेशल कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज भेज दिया गया.

फिलहाल, जांच एजेंसियां आय प्रमाण पत्र और जाति प्रमाण पत्र की भी जांच कर रही हैं, जो संस्थानों ने विभाग को दिए थे. इसके अलावा अन्य कोचिंग संस्थानों और विभाग के अधिकारियों की भूमिका की भी जांच जारी है. एसीबी का कहना है कि इस मामले में आगे और बड़े खुलासे हो सकते हैं. इस पूरे मामले ने एक बार फिर सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर उन योजनाओं पर जो गरीब और जरूरतमंद छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं. 

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