नोएडा के थाना सेक्टर‑63 में दर्ज एक गंभीर आपराधिक मामले में वॉन्टेड स्क्रैप माफिया की जिला कारागार बांदा से रिहाई ने जेल प्रशासन पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, गौतमबुद्धनगर की अदालत ने बी‑वारंट के बावजूद आरोपी रविंद्र सिंह उर्फ रवि नागर उर्फ रवि काना की रिहाई को गंभीर लापरवाही मानते हुए जिला कारागार बांदा के जेल अधीक्षक से स्पष्टीकरण तलब किया है.

कैदी की रिहाई पर जेलर निलंबित
इस बीच यूपी कारागार प्रशासन एवं सुधार सेवाएं मुख्यालय ने जिला कारागार बांदा में तैनात जेलर विक्रम सिंह यादव को निलंबित कर दिया है. यह कार्रवाई 30 जनवरी 2026 को जारी आदेश के तहत की गई है. आदेश के अनुसार, विचाराधीन बंदी रविंद्र सिंह उर्फ रवि काना, जो थाना सेक्टर‑63 नोएडा के एक गंभीर आपराधिक मामले में वॉन्टेड था, उसे जिला कारागार बांदा से रिहा कर दिया गया. शुरुआती जांच में जेलर विक्रम सिंह यादव की भूमिका संदिग्ध पाई गई है.
कर्तव्य में लापरवाही, विभागीय कार्रवाई प्रस्तावित
जांच में यह माना गया कि उन्होंने अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाही बरती, इसी आधार पर उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित करते हुए विभागीय कार्रवाई की गई है. निलंबन अवधि के दौरान उनका मुख्यालय संपूर्णानंद कारागार प्रशिक्षण संस्थान, यूपी निर्धारित किया गया है. संबंधित अधिकारियों को आदेश की कॉपी भेजकर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं. कारागार प्रशासन का कहना है कि यह कदम जेल व्यवस्था में अनुशासन और पारदर्शिता बनाए रखने की दिशा में उठाया गया है.

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नोएडा केस में बी‑वारंट पर तलब था आरोपी
अदालत में सामने आए तथ्यों के अनुसार, आरोपी रविंद्र सिंह उर्फ रवि काना वर्ष 2026 में दर्ज एक केस में भारतीय न्याय संहिता की तीन धाराओं के तहत नामजद है. यह मामला थाना सेक्टर‑63 नोएडा में दर्ज किया गया था. आरोपी पहले से ही किसी अन्य मामले में जिला कारागार बांदा में बंद था. इसी दौरान नोएडा पुलिस ने सेक्टर‑63 के मामले में आरोपी को अदालत में पेश कराने के लिए बी‑वारंट जारी कराया था. बी‑वारंट का आशय होता है कि आरोपी को हर हाल में न्यायालय के सामने पेश किया जाए.
बी‑वारंट के बावजूद जेल से रिहाई पर सवाल
29 जनवरी 2026 को आरोपी को बी‑वारंट के तहत अदालत में पेश किया गया, लेकिन उसी दिन शाम 6 बजकर 39 मिनट पर उसे जिला कारागार बांदा से रिहा कर दिया गया, जबकि नोएडा के इस मामले में उसके खिलाफ न्यायालयीय कार्यवाही जारी थी. अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि जेल प्रशासन को यह जानकारी थी कि आरोपी नोएडा के केस में बी‑वारंट पर तलब है. इसके बावजूद उसे किन परिस्थितियों में और किस आधार पर जेल से रिहा किया गया, यह गंभीर सवाल है.
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मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने जेल अधीक्षक से जवाब तलब
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने जिला कारागार बांदा के जेल अधीक्षक से तीन बिंदुओं पर स्पष्ट जवाब मांगा है. पहला, बी‑वारंट की जानकारी होने के बावजूद आरोपी को जेल से क्यों छोड़ा गया. दूसरा, न्यायालय से कोई स्पष्ट आदेश या सूचना प्राप्त किए बिना आरोपी को किन परिस्थितियों में रिहा किया गया. तीसरा, क्या यह कृत्य आरोपी को कस्टडी से भागने देने जैसा नहीं है और क्यों न इसके लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए.
6 फरवरी तक शपथपत्र, जेल व्यवस्था पर गंभीर सवाल
अदालत ने पूरे मामले को गंभीर लापरवाही मानते हुए जेल अधीक्षक को 6 फरवरी 2026 तक शपथपत्र के साथ स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया है. यह मामला न सिर्फ जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि न्यायिक और पुलिस प्रक्रिया में चूक को भी उजागर करता है. आम तौर पर बी‑वारंट की स्थिति में संबंधित अदालत से स्पष्ट आदेश मिलने तक आरोपी को जेल से रिहा नहीं किया जाता, ऐसे में इस रिहाई ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है.
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