
ब्रिसबेन टेस्ट में दूसरे दिन का खेल ख़त्म होने तक जानकार और फ़ैन्स भारतीय जीत को लेकर अटकलें लगा रहे थे, लेकिन 24 घंटे के अंदर हालात इतने बदल गए कि अब भारतीय टीम के टेस्ट बचाने की बात होने लगी है। दरअसल गेंदबाज़ों की ख़राब लाइन और लेंथ के बाद टीम इंडिया के सामने कई अहम सवाल खड़े हो गए हैं।
ब्रिसबेन में तीसरे दिन ये गेंदबाज़ जिस अंदाज़ में बॉलिंग करते रहे उसने टीम इंडिया के इस पहलू को एक बार फिर खोखला साबित कर दिया। तीसरे दिन पहले सत्र में मिचेल मार्श और ब्रैड हैडिन का पांचवां और छठा विकेट ज़रूर टीम इंडिया की झोली में जल्दी आया, लेकिन उसके बाद कंगारू बल्लेबाज़ हावी हो गए।
आलम ये रहा कि दूसरे सत्र में मेज़बान बल्लेबाज़ों ने 130 रन जोड़े तो तीसरे सत्र में 152 रन। यानी दूसरे सत्र में 23 ओवर में 130 रन तो तीसरे सत्र में 34.4 ओवर में 152 रन। मतलब दूसरे सत्र में ऑस्ट्रेलियाई मिडिल ऑर्डर ने 5 रन प्रति ओवर से ज़्यादा रफ़्तार से रन जोड़े, जबकि टेलएंडर्स ने आखिरी सत्र में 4 रन प्रति ओवर से ज्यादा रफ्तार से रन जोड़े।
आंकड़े इस बात का गवाह हैं कि भारतीय गेंदबाज़ों को अपना होमवर्क और बेहतर करने की ज़रूरत है। पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर और पूर्व पाकिस्तानी गेंदबाज़ शोएब अख़्तर जैसे जानकार इस बात से ख़फ़ा नज़र आते हैं कि भारतीय गेंदबाज़ ग़लतियों से सीखने की कोशिश नहीं कर रहे।
पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर कहते हैं कि ये कोई नई कहानी नहीं है। द.अफ़्रीका में भी ऐसा ही हुआ और न्यूज़ीलैंड में भी ऐसा ही हुआ। लगता है टीम इंडिया के पास कोई प्लान-बी था ही नहीं। भारतीय टीम रणनीति को लेकर पिछड़ती दिखी। हालांकि गेंदबाज़ उमेश यादव कहते हैं कि गेंदबाज़ कोशिश कर रहे हैं। वह मानते हैं कि न्यूज़ीलैंड या द. अफ़्रीका में भी गेंदबाज़ पुछल्ले बल्लेबाज़ों को आउट करने में नाकाम रहे, लेकिन वह कहते हैं कि इसका मतलब ये नहीं है कि वह कोशिश नहीं कर रहे हैं। कई बार बल्लेबाज़ बेहतर खेल दिखा रहे हैं तो कई बार किस्मत की वजह से वह कामयाब नहीं हो पा रहे।
दूसरे दिन जो टेस्ट भारत के पक्ष में नज़र आ रहा था, तीसरे दिन भारतीय गेंदबाज़ों की नाकामी ने उसे ऑस्ट्रेलिया के पक्ष में होने पर मजबूर कर दिया। सवाल ये भी बना रहा कि भारतीय गेंदबाज़ इन सबसे कब सबक़ ले सकेंगे?
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