संजू सैमसन के संजू सैसमन(Sanju Sasmon) बनने की कहानी और सफरनामा बहुत ही रोचक है. सैमसन दिल्ली में क्रिकेट के अपने शुरुआती सबक सीखने के बाद शुरुआती किशोरावस्था में केरल के तिरुवनंतपुरम चले गए, जहां उनके पिता एक पुलिस कांस्टेबल के रूप में काम करते थे. केरल में, उन्होंने जूनियर सर्किट में अपनी बल्लेबाजी से तहलका मचा दिया. यहां उन्होंने प्रभावशाली तकनीक और गेंद को बेहतरीन तरीके से टाइम करने की क्षमता का प्रदर्शन किया. उन्होंने 2011 में अंडर-19 एशिया कप के लिए भारतीय टीम में जगह बनाई, लेकिन टूर्नामेंट में वे कुछ खास प्रभावित नहीं कर पाए, और अगले वर्ष भारत की अंडर-19 विश्व कप टीम में चयन से चूक गए आईपीएल से जुड़े लोग बताते हैं कि साल 2008 के आस-पास केकेआर के टैलेंट स्काउट का ध्यान संजू ने करीब 14 साल की उम्र में लंबे-लबे छक्के मारने की खासियत से जीता था. लेकिन इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) में आगाज करने में उन्हें अगले पांच साल लग गए. शुरुआती 5 सालों में उनके बल्ले से 25-26 का औसत निकला. यह साल 2018 था, जब पहली पार उनके औसत ने 31.50 के स्तर को छुआ. तब से लेकर लेकर सजू सैमसन पिछले 9 साल में अपने आईपीएल औसत को 40 के पार ले गए, लेकिन इन ना सालों में भी उनका यह औसत कभी ऊपर, तो कभी नीचे गया. लेकिन इसकी तुलना में टीम इंडिया के लिए उनके प्रदर्शन में कहीं ज्यादा अनियमितता रही. कभी अर्श पर, तो ज्यादातर फर्श पर! जब गरजे, तो दुनिया ने सर्वश्रेष्ठ टैलेंट करार दिया, जब 'बुझे' यह काफी लंबे समय तक खिंच गया. और यही अनियमितता एक बार को वैभव सूर्यवंशी से ज्यादा उनके टीम इंडिया से बाहर होने की वजह बन गई.
पहले ही साल यंग प्लेयर ऑफ द ईयर बने सैमसन
संजू ने आईपीएल करियर का आगाज साल 2013 में किया. और इस साल खेले 11 मैचों में उन्होंने 18.72 के औसत से 206 रन बनाए, लेकिन उनकी 63 रन की पारी ने पंडितों का ध्यान खींचा था. मगर 63 रन की पारी खुद इस बात का प्रमाण है कि खेली 11 पारियों में उनकी क्षमता के हिसाब से प्रदर्शन में नियमितता नहीं नहीं ही रही. उस समय टीम इंडिया की विकेटकीपिंग में एकछत्र धोनी का राज था, लेकिन समय गुजरने के साथ सैमसन वैसा प्रदर्शन नहीं ही कर सके, जैसा उन्हें करना चाहिए था. और यह टीम इंडिया के सफर में भी साफ दिखाई पड़ा. टी20 में भी और वनडे में भी.

दूसरा टी20 4.6 साल बाद !
सैमसन ने भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय करियर का आगाज 19 जुलाई 2015 में किया, लेकिन अगला मैच खेलने के लिए उन्हें करीब साढ़े चार साल इंतजार करना पड़ा. यह सही है कि इस दौरान एमएस धोनी, ऋषभ पंत और दिनेश कार्तिक टीम इंडिया के लिए खेले, लेकिन सैमसन वैसा प्रदर्शन नहीं ही कर सके, जो उन्हें टीम का हिस्सा बनाने पर मजबूर करता. साफ है, जिम्मेदार सैमसन की इनकंसिस्टेंसी ही रही! और साढ़े चाल बाद दूसरा टी20 खेलने के बाद भी संजू को अपना पहला अर्द्धशतक बनाने के लिए 14 मैच लग गए. अगर सैमसन की अनियमितता को समझना हो, तो इस बात से समजें कि वह शुरुआती 28 टी20 मैचों की 22 पारियों में सिर्फ 2 ही अर्द्धशतक जड़ सके थे.
अनियमितता को और गहराई से समझें
संजू ने करियर के 33 वें और 34वें और 37वें मैच में पांच मैचों के भीतर 3 शतक जड़े, लेकिन फिर अगला पचासा 43वें मैच में आया. और करियर में अभी तक 65 मैचों में 27.01 का औसत और सिर्फ 6 अर्द्धशतक ही बना पाना एक और बड़ी बात है, जो न ही सैमसन की काबिलियत से ही मेल खाती है और न ही प्रदर्शन में नियमितता से
पूरा करियर एक तरफ और...
जब भी विद्वान या इतिहासकार संजू सैमसन के करियर का आंकल करेंगे, तो निश्चित तौर पर वह यही पाएंगे कि संजू के करियर के 59 मैच एक तरफ. और इसके बाद 3 मैच एक तरफ!! जी हां, यह चार महीने पहले भारत की विश्व कप खिताबी जीत में संजू के वेस्टइंडीज, फिर इंग्लैंड और फिर न्यूजीलैंड के खिलाफ क्रमश: 97*, 89 और 89 रन के रूप में लगातार तीन अर्द्धशतक उनके करियर का दूसरा हिस्सा था. संजू ने विश्व कप की शुरुआती विफलता और एकदम खत्म हुए करियर में खेली इन तीन पारियों का असर उनके बनाए रनों की तुलना में इतना प्रचंड और चमकदार है, जिसे करोड़ों भारतीय जीवन में कभी नहीं ही भूल पाएंगे. वो ऐतिहासिक तीन पारियां, जिन्होंने संजू सैमसन को अमर कर दिया !! लेकिन इन पारियों के करीब साढ़े तीन बाद संजू की आयरलैंड और इंग्लैंड के खिलाफ लगातार 3 नाकामियों ने फिर से उनकी अनियमितता को अर्श पर ला दिया. अगर इन मैचों में संजू के बल्ले से एक भी तूफानी पारी आती, तो सूर्यवंशी के लिए टीम इंडिया का गेट नहीं ही खुलता. कम से कम उनकी कीमत पर तो नहीं!

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प्रतिभाशाली हैं, संजू मगर...
सैमसन एक नैसर्गिक बल्लेबाज रहे हैं. ईश्ववर ने उन्हें क्षमता दी है. करियर की शुरुआत में उनकी शैली विंडीज बल्लेबाजों की तरह थी, इसे 'पूरी तरह भारतीय' में तब्दील होने में कई साल लगें, लेकिन उनका फुटवर्क विंडीज बल्लेबाजों की तरह ही बन कर रह गया. और दुनिया का महानतम बल्लेबाज कमर के ऊपरी हिस्से से कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो, लेकिन अगर उसे करियर को लंबा खींचना है, तो टांगों में जरूरी चपलता भी बहुत जरूरी है. इनका कम चलना या 'चिपके रहना' कुछ ही चुनिंदा वजहों में एक रही, जिससे चलते उनके करियर को वह ऊंचाई नहीं मिली, जो मिलनी चाहिए थी. और संजू के स्तर के बल्लेबाज की जो यूएसपी होनी चाहिए थी, वह न होकर इनकंसिस्टेंसी (अनियमितता) ही दिन की समाप्ति पर उनकी यूएसपी (खास बात) बन गई.
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