पिछले दिनों राजस्थान रॉयल्स और रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के 'तूफानी रकम' में बिकने के बाद इंडियन प्रीमियर लीग (Indian Premier League) के दुनिया भर में चर्चे हैं. तमाम बड़ी-बड़ी एजेंसियां और पेशे विशेष के विद्वान मानो आईपीएल पर पीएचडी करने में जुट गए हैं. अलग-अलग पहलुओं से शोध और आंकलन किया जा रहा है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि आने साल 2028-2032 तक के साल इस मेगा टूर्नामेंट के लिए अच्छे नहीं हैं. और एक तरह से इसकी शुरुआत इस साल हो चुकी है! और यह कहना है मीडिया पार्ट एशिया (MPA) की जारी ताजा रिपोर्ट का. रिपोर्ट के अनुसार इसकी सबसे बड़ी वजह मीडिया राइट्स में स्थिरता का होना है. संस्था ने कहा है कि पिछले दो दशकों में आईपीएल के मीडिया राइट्स की वेल्यू में जबर्दस्त उछाल देखा गया था, लेकिन अब यह दौर थमने जा रहा है. बता दें कि पिछले मीडिया राइट्स अवधि (2017-2023) के लिए बीसीसीआई ने करीब पचास हजार करोड़ रुपये में मीडिया राइट्स बेचे थे. इसके तहत टीवी और डिजिटल राइट्स शामिल हैं. लेकिन अब ब्रॉडकास्टर्स को मोटा नुकसान झेलना पड़ सकता है.
मौजूदा चक्र में ब्रॉडकास्टर्स को भारी नुकसान
रिपोर्ट के अनुसार साल 2027 तक चलने वाले मीडिया राइट्स के लिए ब्रॉडकास्टर्स को करीब 1.75 बिलियन डॉलर यानी भारतीय रुपयों में करीब 16,374 करोड़ रुपये का नुकसान झेलना पड़ सकता है. और अगर ऐसा है, तो उसके पीछे कई ठोस वजह हैं. जाहिर है कि अगर BCCI को इससे बचना है, तो उसे अभी से ही इस पर ठोस तरीके से काम करना होगा. बहरहाल, आप पीछे छिपी वजहों के बारे में जान लें
1. प्रतिस्पर्धा की कमी: साल 2023-27 के दौरान स्टार और वायकॉम18 के बीच जो 'बिडिंग वॉर' (बोली की जंग) थी, वह अब रिलायंस-डिज्नी (JioStar) के मर्जर के कारण खत्म हो गई है. इस वजह से भविष्य में बड़ी बोलियां लगने की संभावना काम है. और अगर इस साल ब्रॉडकास्टर को मोटा घाटा हुआ, तो अगले सीजन में BCCI के लिए ज्यादा बिडर्स को खींच कर लाना बहुत ही बड़ा चैलेंज होगा. यह दिख रहा संभावित घाटा ही बड़ी वजह हो चला है, जिससे अगले चक्र (2028-2032) के लिए मीडिया राइट्स के लिए बड़ी बोली मिलना बहुत ही ज्यादा चुनौतीपूर्ण दिख रहा है.
2. ब्रॉडकास्टर्स के लिए मुनाफा कमाना हुआ मुश्किल
मीडिया राइट्स हासिल करने वाले ब्रॉडकास्टरों के लिए मुनाफा निकालना बहुत ही ज्यादा मुश्किल दिखाई पड़ रहा है. वजह यह है कि राइट्स और प्रोडक्शन की रकम मिलाकर हर मैच पर खर्चा ज्यादा हो रहा है, जबकि कमाई कम है. मौजूद पांच साल की अवधि में खर्च करीब 5.93 बिलियन डॉलर है, तो कमाई केवल 4.17 बिलियन है.रुपयों में बात करें, तो खर्चा करीब 55,550 करोड़ रुपये है, तो कमाई है करीब 39,000 करोड़ रुपये. जाहिर है कि नुकसान खासा मोटा है. वहीं, भारतीय बाजार को देखते हुए ऐसा भी नहीं है कि घाटा पूरा करने के लिए तय सीमा से ज्यादा विज्ञापन रेट कर दिए जाएं. अगर ब्रॉडकास्टर ऐसा करता है, तो उसे ऊंची दर पर विज्ञापन नहीं मिल पाएंगे.
3. प्रति मैच की लागत बहुत ज्यादा:
मेगा टूर्नामेंट के शुरुआती साल यानी 2008 से लेकर वर्तमान समय की करें, तो एक मैच की प्रोड्क्शन लागत कई गुना बढ़ चुकी है. साल 2008 में आईपीएल के आगाज के समय डॉलर की कीमत करीब 43.51 रुपये थी. और इस हिसाब से तब हर मैच के प्रोड्क्शन की लागत करीब छह करोड़ और नौ लाख रुपये आती थी, लेकिन अब करीब 18 साल बाद अब यह लागत करीब 124 करोड़ रुपये प्रति मैच हो चुकी है.
भविष्य की चुनौती
फ्रेंचाइजी टीमों के पास कमाई का 75 प्रतिशत हिस्सा मीडिया राइट्स के जरिए ही आता है. और यदि 2028-32 के लिए मीडिया राइट्स की वेल्यू नहीं बढ़ती है, तो फिर सभी टीमों को अपनी कमाई बढ़ाने के लिए बाकी विकल्पों पर ध्यान देना होगा.
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