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This Article is From Nov 01, 2025

विदेश में घर बने 'होटल', पूरी टीम के पास सिर्फ 3 बैट, मंदिरा बेदी की मदद, गावस्कर की बहन ने बयां किए किस्से

India vs South Africa Women Final: अब जबकि टीम इंडिया इतिहास रचने की कगार पर है, तो पूर्व क्रिकेटर अपने समय को बता रही हैं कि उस दौर की खिलाड़ियों ने कैसा समय देखा

विदेश में घर बने 'होटल', पूरी टीम के पास सिर्फ 3 बैट, मंदिरा बेदी की मदद,  गावस्कर की बहन ने बयां किए किस्से
सुनील गावस्कर और उनकी बहन नूतन गावस्कर

अब जबकि टीम हरमनप्रीत कौर (Harmanpreet kaur) वीमेंस विश्व कप (Women's world Cup 2025) में इतिहास रचने की कगार पर खड़ी है, तो अपने समय की पूर्व क्रिकेटर भी बहुत ही अहम खुलासे कर रही हैं, किस्से-कहानियां बता रही हैं. फाइनल की पूर्व संध्या पर दिग्गज बल्लेबाज सुनील गावस्कर की छोटी बहन नूतन गावस्कर ने कहा कि भारतीय महिला क्रिकेट संघ (डब्ल्यूसीएआई) का गठन 1973 में हुआ था और इसने 2006 तक राष्ट्रीय टीम का चयन किया. इसके बाद भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने आखिरकार महिला क्रिकेट को अपने अंतर्गत ले लिया, लेकिन जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो वो ऐसे दिन थे जब पैसे नहीं थे लेकिन सभी महिला खिलाड़ी खेल के प्रति जुनून और प्यार के लिए खेलती थीं.' उन्होंने उन मुश्किल दिनों को याद किया जो भारतीय महिला क्रिकेट संघ के लिए सम्मान की बात रहेंगे, जहां उन्होंने लंबे समय तक सचिव के तौर पर काम किया।

नूतन ने याद करते हुए बताया, ‘जब हमारे पास डब्ल्यूसीएआई था तो हम अंतरराष्ट्रीय महिला क्रिकेट परिषद के अंतर्गत थे. और हमें बताया गया था कि महिला क्रिकेट एक पेशेवर खेल नहीं है. तब पैसे नहीं थे क्योंकि हमें पेशेवर नहीं माना जाता था.ऐसे में अंतरराष्ट्रीय दौरे के लिए फंड जुटाना बहुत मुश्किल होता था और वह भारतीय क्रिकेट के अन्य नेक इरादे वाले और बिना पैसे लिए काम करने वाले लोगों के साथ फंड जुटाने के लिए हर जगह भाग-दौड़ करती थीं.'

लड़कियां अप्रवासी भारतीयों के घर रुकती थीं

नूतन ने कहा, ‘एक बार न्यूजीलैंड का दौरा था जहां हमारे पास लड़कियों के होटल में रुकने का इंतजाम करने के लिए फंड नहीं थे. किसी को विश्वास नहीं होगा कि हमारी टीम प्रवासी भारतीयों के परिवारों के कई घरों में रुकी थी जो मेहमाननवाजी करने में खुशी महसूस करते थे.' उन्होंने कहा, 'एक और मौके पर मंदिरा बेदी ने हमारी मदद की. उन्होंने हीरे के एक मशहूर ब्रांड के लिए एक विज्ञापन शूट किया था. उन्हें जो भी पैसा मिला, वह उन्होंने डब्ल्यूसीएआई को दे दिया जिससे हमने भारत के इंग्लैंड दौरे के लिए हवाई टिकट का इंतजाम किया.'  उस दौर में कई बार ऐसा भी होता था जब एयर इंडिया खिलाड़ियों के लिए हवाई टिकट प्रायोजित कर देता था.  1970, 80 और 90 के दशक ऐसे थे. जब ज्यादातर लोग अपनी मर्जी से महिला क्रिकेट टीम की मदद करना चाहते थे.

टीम के पास सिर्फ 3 ही बल्ले होते थे

नूतन ने कहा, ‘पिछले दिन मुझे जेमिमा रोड्रिग्स की उपलब्धि को सभी राष्ट्रीय अखबारों के पहले पन्ने पर देखकर बहुत खुशी हुई. मुझे वो दिन याद हैं जब हमें बहुत कम कवरेज मिलती थी जिसमें भारतीय महिलाएं जीतीं या भारतीय महिलाएं हारीं शीर्षक होते थे.' नूतन खुद राष्ट्रीय स्तर की क्रिकेटर थीं. उन्होंने याद किया कि कैसे उन्होंने उस समय लंबी तेज गेंदबाज झूलन गोस्वामी को प्रतिभाओं को तराशने के लिए हुए कार्यक्रम में चुना था. नूतन ने 1970 और 1980 के दशक के बारे में बात करते हुए अंतर राज्यीय मैचों को याद किया जहां कुछ टीमों के पास सिर्फ तीन बल्ले होते थे.उन्होंने कहा, ‘मैंने यह राष्ट्रीय प्रतियोगिता में देखा है. निजी क्रिकेट किट महंगी होती थीं जो ‘लग्जरी' होती थी. एक टीम के पास तीन बल्ले होते थे. दो सलामी बल्लेबाजों के पास दो बल्ले होते थे और तीसरे नंबर की खिलाड़ी के पास तीसरा बल्ला होता था. एक बार जब एक सलामी बल्लेबाज आउट हो जाता था तो चौथे नंबर की खिलाड़ी को उसका बल्ला और लेग गार्ड मिल जाते थे.'

ट्रेन का किराया खुद देना  होता था

उन्होंने बताया, ‘ट्रेन की यात्रा सामान्य डिब्बों में होती थीं और महिलाएं अपनी जेब से ट्रेन का किराया देती थीं. कमरे के साथ टायलेट एक लग्जरी थी. अक्सर टीमें ‘डॉरमेट्री' में रहती थीं, जहां 20 लोगों के लिए चार वॉशरूम होते थे और अक्सर वे साफ नहीं होते थ. दाल एक बड़े प्लास्टिक के बर्तन में परोसी जाती थी क्योंकि स्थानीय संघ बहुत कम बजट में टूर्नामेंट आयोजित करती.' डायना एडुल्जी, शांता रंगास्वामी और शुभांगी कुलकर्णी जैसी खिलाड़ियों के लिए मैच फीस अनूठी बात थी. नूतन ने कहा, ‘कोई मैच फीस नहीं थी क्योंकि संघ के पास पैसे नहीं थे. मुझे पता है कि 2005 में दक्षिण अफ्रीका में हुए महिला विश्व कप में उप विजेता रही भारतीय टीम को पुरस्कार राशि मिली थी, लेकिन मुझे याद नहीं कि उन्हें प्रोत्साहन राशि मिली थी या नहीं.' उन्होंने कहा, ‘‘2005-06 के बाद मैंने क्रिकेट प्रबंधन से ब्रेक ले लिया था लेकिन कुछ साल बाद वापस आ गई थी. शुरू में बीसीसीआई का फोकस सिर्फ सीनियर महिला क्रिकेट पर था। पर डब्ल्यूसीएआई ने अंडर-14 और अंडर-16 स्तर पर टूर्नामेंट आयोजित किए. प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को बीसीसीआई ने चुना.'

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