बिहार चुनाव जहां एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नाक का सवाल बन गया है वहीं दूसरी तरफ इसमें नीतीश कुमार और लालू यादव का राजनीतिक भविष्य भी दांव पर लगा है। लालू-नीतीश की अगुवाई वाला महागठबंधन अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए जातीय समीकरणों के दांव पेंच भिड़ाने के साथ साथ विकास की दुहाई भी दे रहा है तो वहीं बीजेपी विपक्षी वोटों को बांट कर अपनी जीत की रणनीति पर लगातार काम करती नज़र आ रही है।
बीजेपी को पता है कि हर हाल में 30-32 फीसदी वोट ही उसके हिस्से आने वाला है लिहाज़ा वो मांझी और पप्पू यादव से लेकर सपा और ओवैसी तक हर किसी के वोट काटने की कूवत को अपनी जीत के लिए सहायक मान कर चल रही है। आरजेडी और जेडीयू से बाग़ी हुए उम्मीदवार बीजेपी की नाव को जीत की तरफ खेने के लिए दूसरे पतवार साबित हो सकते हैं। लेकिन इस बीच बड़ा सवाल है कि बीजेपी की जीत की रणनीति को कहीं लालू की राजनीति और आसान तो नहीं कर रही? ये सवाल इसलिए क्योंकि लालू की राजनीतिक व्यवहार और उनके बयानों के कई पहलु ऐसा सोचने को मजबूर कर रहे हैं। दरअसल सज़ायाफ्ता लालू की सबसे बड़ी राजनैतिक महत्वाकांक्षा खुद को या फिर खुद न सही, अपने बेटे-बेटी को राजनीति में स्थापित कर देने की है।
लालू को क्या मिलेगा...?
फ़र्ज़ कीजिए कि लालू-नीतीश महागठबंधन ये चुनाव जीत लेता है तो फिर सवाल उठता है कि इससे लालू यादव को क्या मिलेगा? सज़ायाफ्ता लालू सरकार में किसी भी तौर पर शामिल हो नहीं सकते। हां, अगर लालू के विधायकों की तादाद नीतीश के विधायकों से अधिक रही तो लालू ‘किंग मेकर’ बन कर अपनी लाठी की नोंक पर बिहार की नीतीश सरकार को चलाने की कोशिश करेंगे। और अगर कम रही तो उनके बेटे को अच्छे मंत्री पद भर से संतोष करना पड़ेगा।
इसमें ख़तरा ये भी है कि अगले विधानसभा चुनाव में नीतीश सरकार पर पांच और साल का एंटी इनकम्बेंसी होगा जिसके हिस्सेदार लालू यादव भी होंगे। अगर तब तक लालू और नीतीश आपस में खटपट की वजह से अलग लड़ने का भी फैसला करते हैं तो भी लालू यादव पर 20 साल का एंटी इंकम्बेंसी होगा। 15 साल का अपना पुराना राज जिसे बीजेपी जंगलराज कहती है। फिर 5 साल का महागठबंधन राज।
अगर लालू हार गए तो...
अगर महागठबंधन चुनाव हार जाता है तो लालू के लिए राजनीतिक परिस्थितियां ज़्यादा मुफ़ीद होंगी। अगर वे सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के तौर पर उभरने में कामयाब रहे तो अगले पांच साल तक वो बीजेपी को चुनौती देते रहेंगे और बिहार में बीजेपी बनाम आरजेडी करने में कामयाब होंगे। हार के साथ ही नीतीश की राजनीतिक हैसियत ज़मीन पर जा गिरेगी जिससे उन्हें उठने में लंबा वक्त लगेगा।
आठ साल तक जिस तरह नीतीश बीजेपी के साथ सत्ता में बैठ कर लालू को निशाना बनाते रहे, लालू के लिए नीतीश पर ये अल्टीमेट राजनीतिक जीत होगी। विपक्ष के मैदान में उनका कोई प्रतिस्पर्धी बचेगा नहीं। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि किसी भी सूरत में लालू के विधायक नीतीश के विधायकों से ज़्यादा हों। और ऐसी कोशिश करते हुए लालू ग़लत भी कहे जा सकते हैं क्योंकि हर राजनीतिक दल ख़ुद को बड़ा बनाने की हमेशा कोशिश करता है।
जानबूझकर काम बिगाड़ना...
लेकिन महागठबंधन में शामिल होकर भी लालू की राजनीतिक चाल ढ़ाल को देखिए। उन्होने स्वाभिमान रैली के दिन से ही अगड़ी जातियों को दुत्कारना शुरु कर दिया, ये जानते हुए भी कि ये 13-14 फीसदी वोट नीतीश की जीत का हिस्सा रहे हैं और इस बार भी नीतीश के लिए निर्णायक साबित होंगे। ये विकास की बाट जोहता वो वोट बैंक है जो लालू के जंगलराज के खिलाफ नीतीश के साथ गया था। अब उसी लालू के साथ नीतीश के हो जाने से दुविधा में है। बीजेपी उसे अपनी तरफ खींचने की पूरी कोशिश में है।
तो क्या लालू जानबूझ कर ‘भूरा बाल साफ करो’ (भूमिहार-राजपूत-ब्राह्मण-लाला) की अपनी पुरानी रणनीति पर इसलिए चल रहे हैं ताकि अपने माय यानि मुस्लिम यादव समीकरण को पुख़्ता करते हुए आरजेडी की जीत तो सुनिश्चित करें लेकिन जेडीयू के वोटों के समीकरण को बिखरा दें? ऐसा इसलिए भी क्योंकि लालू जानते हैं कि अगड़ों का वोट तो उनको मिलने से रहा। इसलिए न खायेंगे न खाने देंगे?
मुलायम का अलग होना...
लालू की रणनीति यहीं रुकती नज़र नहीं आ रही। जिस तरह समाजवादी पार्टी महागठबंन से अलग हुई और अब एनसीपी और पप्पू यादव की पार्टी जन अधिकार मोर्चा के साथ मिल कर चुनाव लड़ रही है वो भी ग़ौरतलब है। मुलायम-लालू दोनों समधी हैं। इस नज़दीकी रिश्तेदारी के बाद भी लालू ने मुलायम को मनाने को कोई गंभीर कोशिश नहीं की। बेशक समाजवादी पार्टी का बिहार में कोई जनाआधार न हो लेकिन जब लड़ाई परसेप्शन के आधार पर लड़ी जा रही हो तो इससे बड़ा फर्क पड़ता है कि घर या एक कुबने के लोग साथ हैं या नहीं। पर शायद लालू को मुलायम का अलग होना सूट करता है।
मुलायम के उम्मीदवार नीतीश के हिस्से वाली सीटों पर उनके उम्मीदवारों के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं बेशक वे महज चंद सौ वोट ही काटने की कूवत रखते हों। ये भी ध्यान देने की बात है कि लालू के उम्मीदवारों के खिलाफ मुलायम अपने उम्मीदवारों को कितना दमखम देते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इस तरह की रणनीति से लालू को अपने उम्मीदवारों की जीत की संभावना को नीतीश के उम्मीदवारों की जीत की संभावना से अधिक रखने में मदद मिलेगी। नीतीश सरकार को लाठी की नोंक पर चलाने या फिर मुख्य विपक्षी पार्टी बनने दोनों के लिए ये ज़रूरी है।
मोदी का साथ...
विचार का एक और दिलचस्प दिमागी कोना है। जयललिता जो कि सज़ायाफ्ता होकर जेल जा चुकीं थीं, फिर से तमिलनाडु की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हैं। हालांकि ये अदालती फैसले से हुआ है और भारत में अदालतें स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। लेकिन ये भी एक तथ्य है कि उनकी पार्टी एआईएडीएमके संसद में सरकार के साथ है। डिप्टी स्पीकर भी उन्हीं की पार्टी से है। जयललिता के इस एक उदाहरण से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के धुर राजनीतिक विरोधियों को भी ये लगने लगा है कि अगर वो किसी भी तरह से मोदी के काम आए तो उनके भी पाप धुल सकते हैं।
चारा घोटाले में सज़ायाफ्ता लालू यादव को रांची हाईकोर्ट से राहत मिलने की पूरी उम्मीद है। अगले दो चार छ महीने में लालू हाईकोर्ट से बरी होकर निकलते हैं तो उनके लिए ये इस चुनाव से बड़ा चुनाव जीतने जैसा होगा। बेशक वे विपक्ष में ही क्यों न बैठें। वैसे भी कहा जाता है कि सीबीआई केंद्र सरकार के इशारे पर काम करती है, आप चाहे राज्य की कितनी भी मज़बूत सरकार के हिस्सा हों।
मुसीबत बना बीफ पर बयान...
अंत में, आरएसएस की तरफ से जातीय आधार पर आरक्षण ख़त्म कर आर्थिक आधार पर लागू करने संबंधी बयान का लालू-नीतीश ने जितना भुनाने की कोशिश की हो, उससे ज़्यादा नुकसान लालू के बीफ़ वाले बयान से होता नज़र आ रहा है। 'हिंदू भी बीफ़ खाते हैं' कह कर लालू ने अपने राजनीतिक करियर की एक बहुत बड़ी भूल की है। इतनी बड़ी की कि कांग्रेस को भी अपनी तरफ से ये संकेत देना पड़ा है कि सोनिया राहुल अब लालू के साथ मंच शेयर नहीं करेंगे।
हालांकि लालू के बयान पर मिट्टी डालने की पूरी कोशिश भी चल रही है। लेकिन लगता नहीं कि लालू ने ये बयान बिना सोचे समझे दिया होगा। यदुवंशी होने के नाते उन्हें गाय की अहमियत और पवित्रता का पता बाद में चला हो ऐसा नहीं है और अंग्रेज़ी भी वे बहुते पहले से धड़ल्ले से बोलते हैं इसलिए उन्हें बीफ़ शब्द के अंतरनिहितार्थों की समझ न हो ऐसा भी नहीं माना जा सकता।
This Article is From Oct 07, 2015
उमाशंकर सिंह का ब्लॉग : लालू क्या विपक्ष में बैठने के लिए लड़ रहे हैं?
Umashankar Singh
- चुनावी ब्लॉग,
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Updated:अक्टूबर 07, 2015 22:04 pm IST
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Published On अक्टूबर 07, 2015 09:20 am IST
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Last Updated On अक्टूबर 07, 2015 22:04 pm IST
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