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छत्तीसगढ़-ओडिशा वाले ध्यान दें! महानदी जल विवाद पर आया आखिरी अल्टीमेटम, जानें क्या होगा

छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच सालों पुराना महानदी जल विवाद अब अपने अंतिम पड़ाव पर है. दरअसल, महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण (MWDT) ने दोनों राज्यों को आपसी सहमति से रास्ता निकालने के लिए 11 जुलाई तक का आखिरी वक्त दिया है. जानिए क्या है पूरा मामला और क्या दोनों राज्यों की 'डबल इंजन' सरकारें क्या इस मुद्दे को सुलझा पाएंगी ?

छत्तीसगढ़-ओडिशा वाले ध्यान दें! महानदी जल विवाद पर आया आखिरी अल्टीमेटम, जानें क्या होगा
छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच सालों से चला आ रहा महानदी जल बंटवारे का विवाद जल्द ही किसी नतीजे पर पहुंच सकता है.
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Mahanadi Water Disputes News: छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) और ओडिशा (Odisha) के बीच सालों से चला आ रहा महानदी जल बंटवारे का विवाद जल्द ही किसी नतीजे पर पहुंच सकता है. दरअसल, महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण (MWDT) ने दोनों राज्यों को एक अंतिम अवसर देते हुए 11 जुलाई तक आपसी सहमति से कोई बीच का रास्ता निकालने को कहा है. ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया है कि अगर 11 जुलाई तक दोनों राज्यों के बीच आम सहमति नहीं बनती है, तो इसके बाद मामले की डे-टूडे सुनवाई कर ट्रिब्यूनल खुद इस पर अपना अंतिम फैसला सुनाएगा.

गौरतलब है कि महानदी के पानी को लेकर दोनों पड़ोसी राज्यों के बीच तनातनी काफी पुरानी है. यह विवाद मुख्य रूप से गैर मानसूनी महीनों यानी गर्मियों के दिनों में पानी के इस्तेमाल और नदी के ऊपरी हिस्से में बने बांधों और बैराजों को लेकर है. इस संवेदनशील मुद्दे को सुलझाने के लिए गठित ट्रिब्यूनल के सामने अब तक दोनों राज्यों की टेक्निकल टीमों की 24 बैठकें हो चुकी हैं. इन बैठकों में दोनों पक्षों ने अपने-अपने अधिकार और डेटा सामने रखे गए, लेकिन हर बार बात किसी ठोस सहमति पर पहुंचने से पहले ही अटक गई. यही वजह है कि अब ट्रिब्यूनल ने सख्त रुख अपनाते हुए आखिरी तारीख मुकर्रर कर दी है.

 पानी पर दोनों राज्यों के अपने-अपने हैं दावे

महानदी का उद्गम छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले से होता है, जिसके चलते छत्तीसगढ़ इस नदी के प्रवाह में ऊपरी हिस्से वाला राज्य है. दोनों राज्यों के अपने-अपने तर्क और दावे हैं. छत्तीसगढ़ की सरकार का तर्क है कि महानदी बेसिन का लगभग 54% कैचमेंट एरिया (जलग्रहण क्षेत्र) छत्तीसगढ़ की भौगोलिक सीमा में आता है. ऐसे में अपने नागरिकों, किसानों और उद्योगों के लिए पानी का इस्तेमाल करना उसका संवैधानिक और भौगोलिक अधिकार है. इसके साथ ही छत्तीसगढ़ का आरोप है कि ओडिशा अपने हीराकुंड बांध के लिए तय कोटे से ज्यादा पानी रोक रहा है. वहीं, ओडिशा महानदी को अपनी 'लाइफ लाइन मानता है. ओडिशा सरकार का आरोप है कि छत्तीसगढ़ ने उसकी सहमति के बिना नदी के ऊपरी हिस्से और सहायक नदियों पर कई बड़े औद्योगिक बैराज और सिंचाई परियोजनाएं खड़ी कर दी हैं. इसके कारण गैर मानसून सीजन में ओडिशा की तरफ पानी का बहाव बेहद कम हो जाता है, जिससे हीराकुंड बांध का जलस्तर गिर जाता है और वहां के किसानों, बिजली उत्पादन व मत्स्य पालन पर बुरा असर पड़ता है.

 दोनों राज्यों में 'डबल इंजन' सरकार से बढ़ीं उम्मीदें

इस पूरे कानूनी और राजनीतिक विवाद के बीच एक अच्छी बात यह है कि वर्तमान में छत्तीसगढ़ और ओडिशा दोनों ही राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं. ऐसे में राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि क्या दोनों राज्यों की 'डबल इंजन' की सरकार होने की वजह से दोनों ही सरकारें आपसी तालमेल का फायदा उठाकर बातचीत से इस मुद्दे को सुलझा लेंगी.

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छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने भी इस ओर इशारा करते हुए सकारात्मक रुख जताया है. उनका कहना है कि चूंकि दोनों राज्यों में हमारी सरकारें हैं, इसलिए बातचीत के जरिए ऐसा रास्ता निकाला जाएगा, जो दोनों राज्यों के किसानों और जनता के हित में हो. वहीं, भूजल वैज्ञानिकों का भी मानना है कि ट्रिब्यूनल के इस अल्टीमेटम के बाद अब दोनों राज्यों पर एक व्यावहारिक समझौते पर पहुंचने का भारी दबाव है.

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