पिछले कुछ समय से कई बड़े विदेशी बैंक भारत में अपना कारोबार छोटा कर रहे हैं या कुछ हिस्सों से बाहर निकल रहे हैं. हाल ही में जर्मनी के डॉयचे बैंक ने भारत में अपना रिटेल बैंकिंग, अफ्लुएंट प्राइवेट बैंकिंग और वेल्थ मैनेजमेंट बिजनेस 281 करोड़ रुपये में कोटक महिंद्रा बैंक को बेचने का फैसला किया है. इसके बाद फिर से सवाल उठने लगे हैं कि आखिर विदेशी बैंक भारत में अपना कारोबार क्यों कम कर रहे हैं?
जर्मनी का डॉयचे बैंक ने कहा कि यह फैसला अपने बिजनेस को आसान बनाने, ज्यादा मुनाफे वाले क्षेत्रों पर ध्यान देने और इंस्टीट्यूशनल व कॉरपोरेट बैंकिंग पर फोकस बढ़ाने के लिए लिया गया है. वहीं कोटक महिंद्रा बैंक के एमडी और सीईओ अशोक वासवानी ने इस डील को बैंक के लिए मजबूत रणनीतिक कदम बताया.
अमेरिका का सिटी बैंक भी 2021 में भारत समेत 13 देशों के रिटेल बैंकिंग बिजनेस से बाहर निकलने का ऐलान कर चुका था. भारत में उसका कंज्यूमर बैंकिंग कारोबार बाद में एक्सिस बैंक ने खरीद लिया. दूसरी तरफ ब्रिटेन का बार्कलेज भी पिछले कुछ वर्षों में भारत में अपनी रिटेल बैंकिंग मौजूदगी काफी हद तक खत्म कर चुका है और अब वह मुख्य रूप से कॉरपोरेट और इन्वेस्टमेंट बैंकिंग पर ध्यान दे रहा है.
बैंकों ने बताए पीछे हटने के तीन बड़े कारण
- विदेशी बैंकों का कहना है कि भारत में टैक्स का बोझ उनके लिए बड़ी चुनौती है. जहां भारतीय बैंकों पर करीब 22% से 25% तक कॉरपोरेट टैक्स लगता है, वहीं विदेशी बैंकों को 36.5% से 38.2% तक टैक्स देना पड़ता है. इससे उनका खर्च काफी बढ़ जाता है.
- दूसरी वजह भारत में सख्त रेगुलेटरी और सुपरवाइजरी नियम हैं. विदेशी बैंकों का कहना है कि इन नियमों का पालन करने में ज्यादा समय और लागत लगती है.
- तीसरी बड़ी वजह बढ़ती प्रतिस्पर्धा है. पिछले कुछ सालों में भारतीय प्राइवेट बैंक और सरकारी बैंक तेजी से मजबूत हुए हैं. साथ ही डिजिटल बैंकिंग और फिनटेक कंपनियों के बढ़ने से भी मुकाबला पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गया है. ऐसे में कई विदेशी बैंक अब उन कारोबारों पर फोकस कर रहे हैं जहां उन्हें ज्यादा मुनाफा मिलने की उम्मीद है.
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