आम खरबूजे की तुलना में ये मीठा भी खूब होता है और रसीला भी. यही नहीं, सख्त छिलके के चलते ये ज्यादा समय तक खराब नहीं होता, इसलिए एक्सपोर्ट के लिए मुफीद होता है. लेकिन मौजूदा दौर में स्थिति ऐसी है कि बॉबी मेलन यानी इस खास खरबूजे को 'आम' भाव भी नहीं मिल रहा. बॉबी खरबूजा इन दिनों आलू के भाव बिकने को मजबूर है. युद्ध में इजरायल, अमेरिका और ईरान हैं, पर इधर भारतीय किसान परेशान है.
दरअसल, ईरान-इजराइल युद्ध के कारण निर्यात ठप होने से महाराष्ट्र के किसान 40 रुपये किलो वाला 'बॉबी खरबूजा' मात्र 10 रुपये में बेचने को मजबूर हैं. पीले रंग का बॉबी खरबूजा (Bobby Melon) अपनी खास दिखावट और स्वाद के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बहुत लोकप्रिय है. खाड़ी देशों जैसे दुबई, ओमान, कुवैत और कतर में इसका एक्सपोर्ट नहीं होने के चलते इसे सही भाव नहीं मिल रहा है.
किसानों की जुबानी, मजबूरी की कहानी
महाराष्ट्र भारत के प्रमुख खरबूजा उत्पादक राज्यों में से एक है. यहां की जलवायु कम पानी और धूप इस फसल के लिए बहुत अनुकूल है. राज्य के हजारों किसान पारंपरिक फसलों को छोड़कर 'बॉबी खरबूजे' जैसी हाई-वैल्यू फसलों की ओर मुड़ते दिखे हैं.
पुणे के इंदापुर तालुका स्थित करेवाड़ी के किसान सचिन करे ने बड़े चाव से पीले रंग के 'बॉबी खरबूजे' की खेती की थी, लेकिन युद्ध के कारण इसका एक्सपोर्ट ठप हो गया है.
नतीजतन, जो खरबूजा बाजार में 40 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकना चाहिए था, उसे अब केवल 10 रुपये प्रति किलो की दर से बेचने की मजबूरी आ गई है. इस गिरते दाम की वजह से किसानों की लागत निकलना भी मुश्किल हो गया है, जिससे क्षेत्र के खेतीहरों में भारी चिंता देखी जा रही है.
खाड़ी देशों ने आयात कम किया, संकट में किसान
महाराष्ट्र में पुणे का इंदापुर, बारामती, दूसरे जिलों में सोलापुर, नासिक और अहमदनगर जिलों में भी इसकी बड़े पैमाने पर खेती होती है. किसानों के लिए ये एक प्रमुख नकदी फसल है, लेकिन एक्सपोर्ट नहीं होने के चलते उन्हें सही भाव नहीं मिल पा रहा और उनके लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है.
साधारण खरबूजे की तुलना में बॉबी मेलन अधिक मीठा और रसीला होता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह जल्दी खराब नहीं होता. सख्त छिलके के कारण इसे लंबी दूरी तक बिना सड़े भेजा जा सकता है, जो इसे एक्सपोर्ट के लिए बेस्ट बनाता है. खाड़ी देशों जैसे दुबई, ओमान, कुवैत और कतर में इसकी भारी मांग है. वहां के होटलों और फ्रूट सलाद मार्केट में इसे प्रीमियम फल माना जाता है.
भारत के स्थानीय बाजार में इसका रेट कम होता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह 40 से 60 रुपये प्रति किलो तक का भाव मिलता है. अब चूंकि युद्ध के कारण समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ गया है, जिससे शिपिंग कंटेनर कम मिल रहे हैं और किराया बहुत बढ़ गया है.
कई देशों ने अपनी सीमाओं और सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए आयात कम कर दिया है. जब माल बाहर नहीं जा पाता, तो वो स्थानीय मंडियों में भर जाता है और दाम गिर जाते हैं.
इनपुट: देवा रखुंदे, इंद्रापुर
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