- अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार आरोप कमजोर थे और इन्वेस्टर्स को कोई वित्तीय नुकसान नहीं हुआ
- आरोपित सिक्योरिटीज अनुभवी वित्तीय संस्थाओं को बेची गई थीं, जिन्हें गुमराह करना मुश्किल था
- विभाग ने कहा कि मामला क्रिमिनल नहीं बल्कि सिविल मामले के रूप में देखना उपयुक्त था और मुआवजा संभव नहीं था
अमेरिकी न्याय विभाग (DoJ) ने शनिवार को एक फेडरल कोर्ट को बताया कि अदाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदाणी के खिलाफ लगे सिक्योरिटीज फ्रॉड केस में इन्वेस्टर्स को कोई वित्तीय नुकसान नहीं हुआ. विभाग ने तर्क दिया कि इन्वेस्टर्स को नुकसान न होने की बात सरकार के अपने ही अभियोजन पक्ष को और कमजोर करती है और सभी आपराधिक आरोपों को खत्म करने के उसके फैसले को और मजबूत करती है.
विभाग ने माना-कमजोर था केस
न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट के अमेरिकी जिला अदालत में दायर एक डिटेल फाइलिंग में विभाग ने कहा कि सिक्योरिटीज फ्रॉड के मामले की मुख्य कमजोरियों में से एक यह थी कि इन्वेस्टर्स को कोई वित्तीय नुकसान नहीं हुआ था. फाइलिंग में कहा गया है, "जिन सिक्योरिटीज की बात हो रही है, उनमें एक भी पैसा कभी डूबा नहीं है." इसमें आगे कहा गया है कि इस मामले से जुड़े दो नोट "पूरी तरह से चुका दिए गए हैं," जबकि "बाकी दो नोटों का भुगतान अभी हो रहा है और भविष्य में इसमें किसी बदलाव का कोई संकेत नहीं है." जस्टिस डिपार्टमेंट ने कहा कि इस बात ने क्रिमिनल केस को काफी कमजोर कर दिया और आरोपों को खारिज करने के पक्ष में ये एक अहम वजह बनी.
'कोई मुआवजा नहीं दिया जा सकता था'
फाइलिंग में यह भी तर्क दिया गया कि जिन लोगों को पीड़ित बताया जा रहा है, वे आम रिटेल इन्वेस्टर्स नहीं थे, बल्कि दुनिया के कुछ सबसे बड़े और सबसे अनुभवी फाइनेंशियल संस्थान थे. विभाग के अनुसार, सिक्योरिटीज को शुरू में विदेशी स्वामित्व वाले बहुत अनुभवी अंडरराइटर्स को बेचा गया था, और फिर उन्हें क्वालिफायड बायर्स को ट्रांसफर किया गया, जिन्होंने बदले में उनका कुछ हिस्सा अनुभवी अमेरिकी इन्वेस्टर्स को बेच दिया. फाइलिंग में कहा गया है, “यह साबित करना मुश्किल होता कि उन अनुभवी फाइनेंशियल संस्थाओं को खोखले वादों से गुमराह किया गया था, क्रिमिनल सिक्योरिटीज मामले की बात तो दूर की है.” विभाग ने आगे तर्क दिया कि यदि अभियोजक इन्वेस्टर्स को गुमराह किए जाने का सबूत देने में सफल भी हो जाते, तब भी कोई वित्तीय हानि नहीं होती क्योंकि नोट या तो चुका दिए गए थे या उनका प्रदर्शन जारी था. इसलिए, विभाग ने निष्कर्ष निकाला कि “वसूली योग्य कोई हानि नहीं थी” और क्रिमिनल केस में कोई मुआवजा नहीं दिया जा सकता था.
'मकसद सिर्फ नाम खराब करना था'
डिपार्टमेंट ने चार्जशीट में शामिल कुछ बयानों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि ये बयान ज्यादातर कंपनियों के अपने प्रमोशन और अपनी छवि बेहतर दिखाने वाले दावे थे, जिन पर बड़े और अनुभवी निवेशक आम तौर पर भरोसा करके निवेश का फैसला नहीं करते. इस मामले में सिक्योरिटीज फ्रॉड के क्रिमिनल आरोप नहीं लगाए जाने चाहिए थे. उनके अनुसार, अगर आरोपों में कुछ दम भी था, तो इस मामले को क्रिमिनल केस की बजाय सिविल मामले के तौर पर देखा जाना ठीक था. न्याय विभाग ने कहा कि सिविल सेटलमेंट होने से पहले ही उसने यह तय कर लिया था कि सिक्योरिटीज से जुड़े आरोपों को खारिज कर दिया जाना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इस सेटलमेंट से इस बात को और बल मिला कि क्रिमिनल आरोप आगे बढ़ाने का कोई फायदा नहीं है. विभाग ने अदाणी के खिलाफ आपराधिक मामले को संभालने के पिछले प्रशासन के तरीके की भी कड़ी आलोचना की और फेडरल कोर्ट से कहा कि ऐसा लगता है कि आरोप पत्र का मकसद सिर्फ "नाम खराब करना और शर्मिंदा करना" था, और इसके कभी ट्रायल तक पहुंचने की कोई वास्तविक संभावना नहीं थी.
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