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कच्चा तेल रिकॉर्ड नीचे, फिर भी देश में क्यों कम नहीं हो रहे पेट्रोल-डीजल के दाम?

मिडिल ईस्ट टेंशन के बाद कच्चे तेल की कीमत रिकॉर्ड गिरकर 67.16 डॉलर/बैरल पर आ गई हैं. इसके बाद भी भारत में तेल कंपनियां पेट्रोल-डी़जल के दाम कम नहीं कर रही हैं. जानिए इसके पीछे की वजह.

कच्चा तेल रिकॉर्ड नीचे, फिर भी देश में क्यों कम नहीं हो रहे पेट्रोल-डीजल के दाम?
मिडिल ईस्ट में शांति की वजह से अब कच्चे तेल की कीमतें लगातार नीचे आ रही हैं.
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मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी जंग शांत होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार नीचे आ रही हैं. पेट्रोलियम मंत्रालय के पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) की रिपोर्ट के अनुसार, 2 जुलाई को कच्चे तेल की कीमत गिरकर 67.16 डॉलर प्रति बैरल के लेवल पर गिर गईं. ये गिरावट इसलिए भी बड़ी है क्योंकि जंग शुरू होने से पहले कच्चा तेल 69 डॉलर प्रति बैरल पर था. जंग के समय कच्चे तेल की कीमतें लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार रहीं, जिसने वैश्विक एनर्जी क्राइसिस देखने को मिला था.

कच्चे तेल की गिरती कीमत

  • अप्रैल, 2026-    114.48/बैरल
  • मई, 2026-        106.23/बैरल
  • जून, 2026-        83.22/बैरल
  • 2 जुलाई 2026-    67.72/बैरल

क्यों कम नहीं हो रहे पेट्रोल-डीजल के दाम?

जब कच्चा तेल लगातार नीचे जा रहा है तो ऐसे में ग्राहकों के मन में ये सवाल उठना सही है कि देश की सरकारी तेल कंपनियां पेट्रोल और डीजल की कीमतों को उसी के अनुसार सस्ता क्यों नहीं कर रही हैं? इस सवाल का जवाब कच्चे तेल के इंपोर्ट की लॉजिस्टिक्स प्रोसेस में मौजूद है. आज देश की ऑयल रिफाइनिंग कंपनियां जिस कच्चे तेल के स्टॉक को रिफाइन करके पेट्रोल-डीजल को बनाकार देश के रिटेल आउटलेट्स पर बेच रही हैं, वो आज का नहीं बल्कि दो महीने पहले इंपोर्ट किया हुआ तेल है. 

यानी देश की सरकार ने दो महीने पहले जब इस तेल को खरीदा था, तब वैश्विक बाजार में कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर थीं. महंगी कीमतों पर खरीदे इस पुराने स्टॉक की वजह से तेल कंपनियां एकदम से कीमतों में कटौती नहीं कर सकतीं.

तेल कंपनियों पर ₹1.88 लाख करोड़ की अंडर रिकवरी

पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, अप्रैल-जून 2026 के समय देश की सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की सेल पर कुल मिलाकर 1,88,871 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी है. इसी 3 महीने के समय में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को टोटल 74,781 करोड़ रुपये का नेट लॉस भी हुआ था.

जंग के समय देश में रहे सामान्य हालात

शनिवार को बारमेर में पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्री हरदीप पूरी ने इसका जिक्र करते हुए कहा, "जब युद्ध के की वजह से दुनिया ऊर्जा संकट से जूझ रही थी, कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर से बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं. कई देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें 40-50% तक बढ़ गईं, कहीं राशनिंग शुरू हो गई, तो कहीं ईंधन के लिए लंबी कतारें लग गईं. लोगों को डराने की कोशिश हुई, अफवाहें फैलाई गईं, राजनीतिक खेल भी खेले गए लेकिन भारत की मजबूत ऊर्जा नीति और कुशल प्रबंधन के सामने वे सभी प्रयास फेल साबित हुए. अप्रैल से जून के बीच पेट्रोल-डीजल पर लगभग 75,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ तेल कंपनियों ने सहा, जिसे सरकार ने अपने ऊपर लिया, जिससे आम नागरिक पर वैश्विक संकट का भार ना पड़े."

आम जनता को कब मिलेगी राहत?

पेट्रोलियम मंत्री कई मौके पर कह चुके हैं कि आम जनता को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी का फायदा तब ही मिल सकता है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में आई ये गिरावट अगले 2 से 3 महीनों तक स्टेबल रहे. कंपनियों को पहले अपने पुराने घाटे और अंडर-रिकवरी की भरपाई करनी होगी. इसलिए ग्राहकों को 2 से 3 महीने का इंतजार करना पड़ेगा.

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