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Lab-Grown Gold: क्या यह असली सोने जितना प्योर है? खरीदने से पहले जान लें रीसेल वैल्यू का ये बड़ा पेंच

Lab-Grown Gold vs Mined Gold: सोने की माइनिंग से जमीन को नुकसान पहुंचता है,भारी मात्रा में पानी खर्च होता है और कार्बन एमिशन भी होता है.लैब-ग्रोउन या रिसाइकल्ड गोल्ड का इस्तेमाल इसे काफी हद तक कम कर सकता है.

Lab-Grown Gold: क्या यह असली सोने जितना प्योर है? खरीदने से पहले जान लें रीसेल वैल्यू का ये बड़ा पेंच
Lab-Grown Gold उन लोगों के लिए एक बेहतरीन ऑप्शन है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना असली सोना पहनना चाहते हैं.
नई दिल्ली:

भारत में सोना सिर्फ एक मेटल नहीं, बल्कि परंपरा, भावनाओं और निवेश से जुड़ा हुआ है. शादी-विवाह से लेकर त्योहारों तक हर खास मौके पर सोना खरीदा जाता है. लेकिन अब ज्वेलरी मार्केट में एक नया ट्रेंड तेजी से चर्चा में है और वो हैलैब-ग्रोन गोल्ड (Lab-Grown Gold).कई लोग इसे लेकर उलझन में हैं कि क्या यह असली सोने जैसा ही होता है, क्या यह खादान से निकले सोने जैसा ही प्योर है? क्या इसकी कीमत कम होगी और सबसे बड़ा सवाल क्या इसे खरीदना सुरक्षित और सही निवेश है? आइए आसान भाषा में समझते हैं कि लैब में बना सोना आखिर है क्या और यह क्यों चर्चा में है.

क्या होता है Lab-Grown Gold?

लैब-ग्रोउन गोल्ड यानी ऐसा सोना जो जमीन से माइनिंग करके नहीं निकाला जाता, बल्कि साइंटिफिक टेक्नोलॉजी की मदद से लैब में तैयार किया जाता है.खास बात यह है कि यह बिल्कुल असली सोने जैसा ही होता है. यानी यह  गोल्ड-प्लेटेड या नकली नहीं होता, बल्कि असली सोना ही होता है बस बनने का तरीका अलग होता है.

असली सोना और लैब-ग्रोउन गोल्ड में क्या है अंतर?

ऐसे दिखने में में दोनों बिल्कुल एक जैसे होते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि एक जमीन के नीचे से निकलता है और दूसरा कंट्रोल सेटिंग में मशीन से तैयार होता है. लैब वाला सोना उन लोगों के लिए एक बेहतरीन ऑप्शन है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना असली सोना पहनना चाहते हैं.

कैसे बनाया जाता है लैब में सोना?

लैब-ग्रोउन गोल्ड बनाने के लिए मुख्य रूप से दो तरीके अपनाए जाते हैं...

  1. पहला तरीका एटॉमिक-लेवल टेक्नोलॉजी का है, जिसमें साइंटिफिक लेवल पर सोने के परमाणुओं को बनाकर सोना तैयार किया जाता है. हालांकि यह प्रक्रिया अभी बेहद महंगी है और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल नहीं हो रही.
  2. दूसरा तरीका रिसाइकल्ड गोल्ड से जुड़ा है. इसमें पुराने सोने को लैब में रिसाइकिल करके  सुपर-प्योर गोल्ड बनाया जाता है.

हालांकि लैब-ग्रोउन डायमंड की तरह यह टेक्नोलॉजी अभी ज्वेलरी मार्केट में बड़े लेवल पर नहीं पहुंची है.

ज्वेलरी इंडस्ट्री में क्यों बढ़ रही है इसकी मांग?

आज दुनिया भर में ज्वेलरी इंडस्ट्री पर सस्टेनेबल और इको फ्रेंडली तरीकों को अपनाने का दबाव बढ़ रहा है.सोने की पारंपरिक माइनिंग में बड़ी मात्रा में जमीन, पानी और खतरनाक केमिकल जैसे साइनाइड और मरकरी का इस्तेमाल होता है.

इसके मुकाबले लैब-ग्रोउन गोल्ड को एक ज्यादा इको फ्रेंडली और एथिकल माना जा रहा है. खासकर युवा कस्टमर अब ऐसी ज्वेलरी को पसंद कर रहे हैं जो नेचर को कम नुकसान पहुंचाए.

क्या लैब-ग्रोउन गोल्ड सस्ता है?

अभी के समय में लैब-ग्रोउन गोल्ड माइन्ड गोल्ड से बहुत ज्यादा सस्ता नहीं है. इसकी वजह यह है कि इसे बनाने में एडवांस टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है, जिससे लागत बढ़ जाती है. हालांकि जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी बेहतर होगी, प्रोडक्शन कॉस्ट कम हो सकती है, जिससे भविष्य में कीमतों पर असर पड़ सकता है.

रीसेल वैल्यू पर क्या असर पड़ेगा?

सोना खरीदते समय सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि रीसेल में यानी दोबारा बेचने पर कितना पैसा मिलेगा.लैब-ग्रोउन गोल्ड के मामले में भी इसकी कीमत वजन, प्यूरीटी और उस समय के गोल्ड रेट पर ही तय होगी.अगर इसकी शुद्धता माइन्ड गोल्ड के बराबर है, तो रीसेल वैल्यू भी समान हो सकती है.लेकिन बाजार में इसे पूरी तरह स्वीकार किए जाने में समय लग सकता है, इसलिए शुरुआती दौर में कुछ ज्वेलर्स इसे अलग तरीके से  देख सकते हैं.

क्या लैब-ग्रोउन गोल्ड निवेश के लिए सही है ?

ऐसे देखा जाए तो लैब-ग्रोउन गोल्ड असली सोना ही है.लेकिन निवेश के नजरिये से फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि आपकी जरूरत क्या है.जो लोग सस्टेनेबल और एडवांस ऑप्शन चाहते हैं, उनके लिए यह शानदार हो सकता है.वहीं ट्रेडिशनल खरीदार आज भी नेचुरली खादानों से निकले सोने को ज्यादा महत्व देते हैं.

लैब-ग्रोउन गोल्ड एक एडवांस ऑप्शन जरूर है, लेकिन घरों में उसी भरोसे और भावनात्मक महत्व को हासिल करने में इसे अभी समय लग सकता है.

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